तुलना कैसी?

एक समुराई अपनी वीरता और सत्यप्रियता के लिए प्रसिद्द था. वह एक ज़ेन गुरु के पास एक समस्या का उपाय जानने के लिए गया.

जब ज़ेन गुरु ने अपनी प्रार्थना पूरी कर ली, समुराई ने पूछा:

“मैं स्वयं को बहुत हीन अनुभव करता हूँ. न जाने कितने ही बार मैंने मृत्यु को अपने समक्ष देखा है और निर्बल जनों की रक्षा की है. परंतु आज आपको यहाँ ध्यानमग्न देखकर मुझे यह प्रतीति हो रही है कि मेरे होने-न-होने का कोई महत्व नहीं है.”

“तुम थोड़ा प्रतीक्षा करो. मैं अपने आगंतुकों से मिलने के बाद तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दूंगा”, गुरु ने कहा.

समुराई ने पूरा दिन मंदिर के उद्यान में बिताया. गुरु से मिलने के लिए आनेवाले व्यक्ति एक-एक करके चले गए. समुराई ने देखा किस तरह गुरु ने सभी के प्रश्नों का उत्तर अपार धैर्यपूर्वक और मुस्कुराते हुए दिया.

सभी चले गए. रात हो गयी. अधीर समुराई ने गुरु से पूछा, “अब आप मेरे प्रश्न का उत्तर दीजिये”.

ज़ेन गुरु समुराई को अपने कक्ष में लेकर गए. खिड़की के बाहर पूर्णिमा का चंद्रमा आलोकित था. सम्पूर्ण वातावरण में दिव्य शांति व्याप्त थी.

“चंद्रमा बहुत सुन्दर है न? रात भर पूरे नभमंडल को नापता हुआ वह अस्त हो जाएगा और कल सूर्योदय होगा”.

“सूर्य की प्रचंड दीप्ति के सामने चंद्रमा का क्षीण प्रकाश कुछ नहीं है. परिदृश्य की सारी बारीकियां, नदी, पर्वत, वृक्ष आदि सूर्य के प्रकाश में सर्वाधिक स्पष्ट दिखते हैं.”

“दो वर्षों से मैं हर रात्रि यहाँ ध्यान-साधना करता आ रहा हूँ, पर मैंने चंद्रमा को कभी यह कहते नहीं सुना, ‘मैं सूर्य की भांति क्यों नहीं चमकता? मैं इतना तुच्छ क्यों हूँ?”

“ऐसा कैसे हो सकता है?”, समुराई ने कहा, “सूर्य और चंद्रमा दोनों विभिन्न वस्तुएं हैं. दोनों का अपना सौंदर्य है! आप इन दोनों की तुलना नहीं कर सकते”.

“तो तुम अपने प्रश्न का उत्तर जानते हो”, गुरु ने कहा, “हम दोनों अलग-अलग प्रकार के व्यक्ति हैं और अपनी आस्थाओं और विश्वास के अनुरूप हम दोनों ही युद्धरत हैं. हम दोनों ही दुनिया को बेहतर बनाने के लिए कर्म कर रहे हैं, इसके अतिरिक्त जो कुछ भी है वह केवल आभास मात्र ही है”.

17 Comments

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17 Responses to तुलना कैसी?

  1. सत्‍य हमारे इर्द-गिर्द, बल्कि हम में ही निहित है, आवश्‍यकता दृष्टि की होती है.

  2. कर्म की नाव खेते रहो ,सत्यम शिवम् सुन्दरम ,

  3. AKGaur

    It is really good.May I have this article in English?

  4. G Vishwanath

    यही हमारी कमजोरी है।
    हम तुलना करते रहते हैं और उदास होते हैं।
    जब तुलना करनी ही है, क्यों न हम अपने से नीचे स्थित लोगों से तुलना करें?
    तब पता चलेगा के हम पर ईश्वर की कृपा है।
    मन को शान्ति मिलेगी
    केवल अपने आपको सुधारने के लिए, हमें अपने से बेहतर लोगों से तुलना करनी चाहिए।
    शुभकामनाएं
    जी विश्वनाथ

  5. वाह!! बेहद मननीय संदेश देती बोध कथा!!

    अनावश्यक तुलना व्यर्थ है।

    और दूसरा संदेश= जानते हुए भी तुलनारत रहकर न समझ पाने में जीवन ही व्यर्थ है।
    अतुल्य प्रस्तुति, निशांत जी, अमूल्य आभार!!
    _______________________________________
    सुज्ञ: जीवन का लक्ष्य

  6. I liked this story very much. I would like to request to send other stories like this. Thanks a lot.

  7. मन में उतर गया ….

    इन प्रेरक प्रस्तुतियों के लिए किन शब्दों में धन्यवाद ज्ञापन करूँ…समझ नहीं पा रही…

  8. प्रवीण पाण्डेय

    सच कहा आपने, सबकी अपनी क्षमता, सबका अपना सौन्दर्य।

  9. कुदरत की बक्शी हर चीज ,अपने में पूर्ण-सम्पूर्ण और सुंदर है …..

  10. how wenderful story veery good

  11. सबका अपना-अपना महत्व है, और वह दुनिया को सुंदर बनाने में अपना योगदान देता है।

  12. बहुत अच्छा है | सत्य हर प्राणी में विद्यमान रहता है परन्तु महसूस आत्मचिंतन एंव प्राणी मात्र की सेवा पर ही जान पडता है |
    धन्यवाद |

  13. ali

    बोध…सच कहूं तो एक ज़ेन और समुराई में यही फर्क है ! शौर्य और ज्ञान के अपने अपने सौंदर्य हैं तो सही पर बोध का फर्क ही समुराई को ज़ेन तक खींच लाया ! पारस्परिक तुलना जन्य अनुभूतियों के अपने सुख दुःख हैं अब जो जैसा निर्वाह करना चाहे ! अपने यहां संतोष को परमसुख कहा गया है फिर चाहे उसके कारण / आधार जो भी हों :)

  14. बहुत सुन्दर कहानी – धन्यवाद |

  15. Pingback: बोतल घुसी कमोड में, चोकित हो गया पाट : चिट्ठा चर्चा

  16. अन्तर सोहिल

    प्रेरक कथा के लिये आभार
    हर चीज की अपनी महत्ता और सुन्दरता है। अपने आप सबकुछ सम्पूर्ण है।

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