क्षमा

ईसाई मठ के महंत ने अपने प्रिय शिष्य से पूछा – “पुत्र, साधना के पथ पर तुम्हारी प्रगति संतोषजनक है न?”

शिष्य ने कहा – “जी, मैं यह प्रयास करता हूँ कि दिन में एक पल भी मुझे ईश्वर का विस्मरण न रहे”.

“यह तो बहुत अच्छी बात है. अब तुम्हारे लिए एक यही बात बची रह गयी है कि तुम अपने शत्रुओं को क्षमा कर दो” – गुरु ने कहा.

शिष्य को यह सुनकर बड़ा विस्मय हुआ. उसने कहा – “लेकिन मैं किसी भी शत्रु पर कुपित नहीं हूँ!”

“क्या तुम्हें यह लगता है कि ईश्वर तुमसे रुष्ट है?” – गुरु ने पूछा.

“बिलकुल नहीं!” – शिष्य बोला.

“फिर भी तुम ईश्वर से हर पल तुम्हें क्षमा करने के लिए प्रार्थना करते रहते हो. भले ही तुम्हारे मन में तुम्हारे शत्रुओं के लिए घृणा न हो पर तुम्हें उनसे क्षमायाचना करते रहना चाहिए. जो व्यक्ति क्षमाशील बनते हैं उनका ह्रदय निर्मल और पवित्र हो जाता है”.

9 Comments

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9 Responses to क्षमा

  1. बहुत आवश्यक और प्यारी पोस्ट , हार्दिक शुभकामनायें !
    मगर क्या यह मेरे समझ आएगी गुरुवर ?

  2. वाणी गीत

    बहुत अच्छा सन्देश …
    सुबह सुबह आपकी पोस्ट पढ़कर मन सकारत्मक भावों से भर जाता है …

  3. bahut hi uttam sandesh……….

  4. प्रवीण पाण्डेय

    अनुकरणीय और गहरी बातें।

  5. मन धोने का साबुन तलाश रहा था – यह मिला, क्षमा ब्राण्ड!

  6. वाह. आपका यह पोस्ट और ब्लॉग मुझे बहुत पसंद आया. मगर पोस्ट फीड तो सबस्क्राइब करने गया तो बहुत बदतमीजी से पेश आया :(
    यह देखिये – http://i51.tinypic.com/2n8sw2d.jpg

    • हां सौरभ, यह तो बड़ी अजीब बात है. इसका कारण ढूंढना पड़ेगा.
      आप ई-मेल से सब्सक्राइब कर लें. उसकी शिकायत नहीं सुनी आजतक.

  7. rafatalam

    जो व्यक्ति क्षमाशील बनते हैं उनका ह्रदय निर्मल और पवित्र हो जाता है”.काश इस मन्त्र का ३०%लोग भी पालन करले तो मानव की सारी परेशानी दूर हो जाये

  8. ashish

    that is very good things.i like this stories.

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