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प्यारे कनाडावासी दंपत्ति का बड़ा दान

दो-तीन दिन पहले मुझे याहू न्यूज़ की साईट पर यह खबर पढ़ने को मिली तो मुझे लगा कि इसे यहाँ पोस्ट किया जा सकता है.

सेवानिवृत्त कनाडियन दंपत्ति ने लौटरी में जीते हुए 11,255,272/- कनाडियन डॉलर (लगभग 50 करोड़ रुपये) की रकम दान में दे दी है.

“जो हमारे पास पहले ही नहीं था उसकी कमी क्या महसूस करना?” – 78 वर्षीय वायलेट लार्ज ने एक स्थानीय रिपोर्टर से कहा.

जुलाई में जब दंपत्ति को लौटरी जीतने का समाचार मिला उस समय वायलेट कैंसर के उपचार के लिए कीमोथैरेपी ले रहीं थीं.

“हमारे पास एक-दूसरे का साथ है. यह पैसा हमारे लिए कुछ नहीं है.” – वायलेट के पति ऐलन ने भावुक होकर कहा.

“यह पैसा अपने साथ बहुत बड़ा सरदर्द लेकर आया. हमें हर समय यही लगता रहा कि बुरे लोग कहीं इसके लालच में हमें नुकसान न पहुंचा दें. हमें लौटरी मिलने की खबर सुनते ही अचानक से ही बहुत से ज़रूरतमंद लोग न जाने कहाँ से प्रकट हो गए. इसलिए हमने जल्द-से-जल्द इस रकम को ठिकाने लगाने के लिए सोचना शुरू कर दिया.”

उन्होंने पहले पारिवारिक ज़रूरतों के लिए दो प्रतिशत रकम अलग कर दी, फिर दान के लिए दो पन्नों में संस्थाओं को छांटा जिनमें लोकल अग्निशमन दल, चर्च, कब्रिस्तान, रैड क्रॉस, साल्वेशन आर्मी, और उन अस्पतालों के नाम थे जहाँ वायलेट का उपचार हो रहा था. कैंसर, अल्जीमर्स, और डायबिटीज़ से सम्बद्ध संस्थाओं के नाम भी शामिल किये गए. लिस्ट बड़ी होती गयी.

“हमें यह देखकर अच्छा लगा कि पैसा इतने सारे अच्छे कामों में लग गया” – वायलेट ने कहा.

नोवा स्कॉटिया दंपत्ति पिछले पैंतीस सालों से एक-दूसरे के प्रति समर्पित हैं. ऐलेन ने वेल्डर के काम से और वायलेट ने स्टोर में नौकरी करके बुढ़ापे के लिए शांतिपूर्वक संतोषजनक धन जुटा लिया था.

“हमने अपने ऊपर एक पैसा भी खर्च नहीं किया क्योंकि हम पूरे समय ज़रूरी कामों में लगे रहे और ऐसी अस्वस्थता में कुछ करने के लिए मुझे बहुत ताकत जुटानी पड़ेगी. हम लोग पर्यटन नहीं कर सकते. इस देहात में ही हमें अच्छा लगता है. पैसे से कोई स्वास्थ्य और खुशियाँ तो नहीं खरीद सकता” – वायलेट ने कहा.

अब पूरे गाँव में उनकी बातें होती रहती हैं. – “उन्हें बेहतर जाननेवाले लोग यह जानते हैं कि उनके लिए एक-दूसरे का साथ सबसे बड़ी चीज़ है” – स्थानीय रेस्तरां मालिक ने पत्रकार को बताया.

खबर की लिंक यह है.

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7 Comments Post a comment
  1. सकारात्मक समाचार… दिल खुश हुआ…

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    November 8, 2010
  2. प्रवीण पाण्डेय #

    सच है, एक दूसरे का साथ है तो सब कुछ है।

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    November 8, 2010
  3. अच्छा सबक देती हुई पोस्ट के लिए धन्यवाद निशांत !

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    November 8, 2010
  4. G Vishwanath #

    यह साधारण लोग नहीं हैं। इन लोगों को मेरा अनाम नमन।

    कैनाडा में ऐसा कर सकते हैं।
    पर भारत में?
    हम तो कल्पना भी नहीं कर सकते कि हम ऐसा करेंगे, यदि भगवान ने छप्पर फ़ाडकर हमें ऐसा कुछ दिया।
    सोचेंगे कि इस पैसे को हम ही रखेंगे और कोई नेक/शुभ काम में लगाएंगे
    समाज की भलाई भी होगी और इस पर हमारा नियंत्रण भी होगा और अन्य लोग पैसे का दुरुपयोग नहीं कर सकेंगे।
    यहाँ किसी पर भरोसा करना कठिन हो गया है।
    तिरुपति गया हूँ।
    वहाँ लोगों को नोटों का ढेर दान पेटी में डालते देखा हूँ।
    संभवत यह धन काला है।
    यह लोग सोचते हैं कि भृष्ट सरकार के हाथ में कर के रूप में देने से बेहतर है कि ईश्वर के चरणों में रख दें।
    मन्दिर का ट्रस्ट इसका बेहतर उपयोग करेगा।
    जी विश्वनाथ

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    November 8, 2010
    • आपका कहना सही है.
      बहुत से देशों में निगरानी तंत्र इतना कठोर है कि वहां के नागरिक शासन से कुछ छिपा नहीं सकते. इसलिए वहां करों की चोरी और खरीद-फरोख्त में बेईमानी नहीं चलती.
      भारत में अनुमानतः मंदिरों और मठों के पास खरबों की संपत्ति है और इसके कुछ अंश मात्र से ही उनके संचालक मालामाल हो जाते हैं. भावनात्मक कारणों से कोई इसपर किसी प्रकार की चर्चा या कार्रवाई नहीं करना चाहता.

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      November 8, 2010
  5. Thanks for your visit sir!

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    November 8, 2010
  6. बहुत प्रेरक समाचार है.

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    November 9, 2010

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