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Tell Your Story… – अपनी कथा कहो…

महान रब्बाई इज़राएल शेम तोव ने देखा कि उनके लोगों के साथ अन्याय हो रहा है और इसे दूर करने का उपाय करने के लिए वे वन में गए. वहां उन्होंने पवित्र अग्नि प्रज्वलित की और अपने धर्मावलम्बियों की रक्षा के लिए परमेश्वर से प्रार्थना की.

और परमेश्वर ने उनकी प्रार्थना सुनकर उन्हें चमत्कार सौंपा.

बाद में उनके शिष्य मेज़रेथ के मैगिद ने भी अपने गुरु के पदचिह्नों का अनुसरण किया. वन में उसी स्थान पर जाकर उसने भी परमेश्वर से कहा – “हे परमपिता, मुझे पवित्र अग्नि प्रज्वलित करना नहीं आता पर मैं शास्त्रोक्त प्रार्थना कहता हूँ… मेरी प्रार्थना सुनो!”

और इस बार भी चमत्कार प्रकट हुआ.

एक और पीढ़ी गुज़र गयी और सोसोव के रब्बाई मोशे-लीब ने जब युद्ध आसन्न देखा तो वन में जाकर परमेश्वर से कहा – “परमपिता, मुझे पवित्र अग्नि प्रज्वलित करना नहीं आता और मैं विधिवत प्रार्थना भी नहीं जानता लेकिन इसी स्थान पर मेरे पुरखों ने आपका स्मरण किया था. हमपर दया करो, प्रभु!”

और ईश्वर ने उसकी सहायता की.

पचास साल बाद रिज़िन के रब्बाई इज़राएल ने अपनी व्हीलचेयर पर बैठकर कहा – “मुझे पवित्र आग जलाना नहीं आता, मैं प्रार्थना भी नहीं जानता और मुझे वन के किसी स्थान का भी कुछ पता नहीं है. मैं केवल इस परंपरा का स्मरण कर सकता हूँ और मुझे आशा है कि ईश्वर मुझे अवश्य सुनेगा”

और इस प्रकार परंपरा का स्मरण मात्र ही संकट को टालने के लिए पर्याप्त था.

मैं इसमें यह जोड़ना चाहूँगा:
अपनी कथा कहो… अपनी परंपरा का स्मरण करो. बहुत संभव है कि तुम्हारे पडोसी तुम्हें समझ नहीं पायें पर वे तुम्हारे मन की शुद्धता को अवश्य देख लेंगे. कथाएं ही वह एकमात्र सेतु रह गईं हैं जो विभिन्न संस्कृति और सभ्यताओं के मनुष्यों को एक सूत्र में जोड़ सकतीं हैं.

(यह कहानी पाउलो कोएलो की इस पोस्ट का स्वतन्त्र अनुवाद है)

The great Rabbi Israel Shem Tov, when he saw that the people in his village were being mistreated, went into the forest, lit a holy fire, and said a special prayer, asking God to protect his people.

And God sent him a miracle.

Later, his disciple Maggid de Mezritch, following in his master’s footsteps, would go to the same part of the forest and say: “Master of the Universe, I do not know how to light the holy fire, but I do know the special prayer; hear me, please!”

The miracle always came about.

A generation passed, and Rabbi Moshe-leib of Sasov, when he saw the war approaching, went to the forest, saying:

“I don’t know how to light the holy fire, nor do I know the special prayer, but I still remember the place. Help us, Lord!”

And the Lord helped.

Fifty years later, Rabbi Israel de Rizhin, in his wheelchair, spoke to God: “I don’t know how to light the holy fire, nor the prayer, and I can’t even find the place in the forest. All I can do is tell this story, and hope God hears me.”

And telling the story was enough for the danger to pass.

And I will add:

Tell your stories. Your neighbors may not understand you, but they will understand your soul. Stories are the last bridge left to allow different cultures to communicate among each other.

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5 Comments Post a comment
  1. कमल वलेरा #

    बहूत हि सच बात हे यह दिल से कि गइ प्राथना पुजा का रुप ले लेती हे मन को छु लेने वाली कहानी धन्यवाद निशांतजी.

    Like

    October 30, 2010
  2. प्रवीण पाण्डेय #

    प्रार्थना में बड़ी शक्ति है, परम्परा तो बनी रहेगी।

    Like

    October 31, 2010
  3. rafat alam #

    निशांत जी ,महापुरूषों की बातें तो सर्वमान्य हैं ही मुझे आज आपका छोटा सा स्टेमेंनट बहुत पसंद आया जो आपने कथा में जोड़ा है .सचमुच विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृति की ये कथाएँ हमारे बीच सेतु का कार्य करती हैं.

    Like

    October 31, 2010
  4. अपनी कथा कहो… अपनी परंपरा का स्मरण करो. बहुत संभव है कि तुम्हारे पडोसी तुम्हें समझ नहीं पायें पर वे तुम्हारे मन की शुद्धता को अवश्य देख लेंगे. कथाएं ही वह एकमात्र सेतु रह गईं हैं जो विभिन्न संस्कृति और सभ्यताओं के मनुष्यों को एक सूत्र में जोड़ सकतीं हैं.

    100% sahi kaha aapne…

    prerak sundar is prasang ke liye sadhuwaad !!

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    November 1, 2010
  5. यह कथा बहुत कुछ कहती है..

    आचार नहीं, विचार शुद्ध हो..तो बात बनेगी !
    विनत भाव ही ईश्वर को करुणार्द्र करने को पर्याप्त है ।
    साधन का महत्व नहीं, महत्व साधना का है ।

    देवी का क्षमापन स्तोत्र भी तो यही कहता है .. “न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो…….”

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    November 2, 2010

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