प्लीज, एक फोटो मानव का भी इस श्रंखलामें इस लेख के साथ जुडना चाहिए life is for once ,do not kill me .
प्रकर्ति कि हत्या (जंगल कटाई,जल-वॉयू प्रदूषण आदि )-अंततःमानव विनाशकरेगी. बात बेबात बम /गोली बारी आत्मघाती हो कि अमरीकी -पाकिस्तानी – इसरायली-अफगानी .हिंसा ही हिंसा है चारों दिशा.रंग- नस्ल- जाति -धर्म के झगड़े और आदमी मारा जा रहा है . आदमी जिस प्रकार सेल्फ विनाश कर रहा है उस के लिए किसे फ़िक्र है .कोई इस बाबत क्यों चितित हो.खास तोर पर मोत कि सोदागर मल्टीनेशनल कंपनिया है. पर इनके सोने चमक के सामने कोई व्यक्ति तो छोडो देश नत -मस्तक देख रहा हूँ.एक बार फिर लिख ता हूँ LIFE IS FOR ONCE-DO NOT KILL ME
इन पोस्टर और इससे संबधित पुस्तक ‘स्वर्ग कोई भी जा सकता है, बस अच्छे बनो !’ को निशुल्क मगाने और डाउनलोड करने के लिये के लिये http://www.justbegood.net/Hnd01Index.htm पर जायॆ और अनुरोध भेजें ।
भाई अपन तो खाते क्या छूते ही नहीं हैं
और कोई खाता है तो उसे भी परेशान करते हैं
कुछ इस तरह “यार सोच तो … ये {पशु} थोड़ी देर पहले हँसता खेलता घूम रहा होगा , तब कैसा लगता होगा?? , अब कैसा लग रहा है? है ना ??”
बेहद अच्छा संदेश , सच ही तो है जीवन अमूल्य है चाहे वो कोई भी हो…..इंसान, पेड़ पोधे , पक्षी…जानवर….
regards
आपको अपना बहुमूल्य समय और टिप्पणी देने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया.
बहुत अच्छा।
प्लीज, एक फोटो मानव का भी इस श्रंखलामें इस लेख के साथ जुडना चाहिए life is for once ,do not kill me .
प्रकर्ति कि हत्या (जंगल कटाई,जल-वॉयू प्रदूषण आदि )-अंततःमानव विनाशकरेगी. बात बेबात बम /गोली बारी आत्मघाती हो कि अमरीकी -पाकिस्तानी – इसरायली-अफगानी .हिंसा ही हिंसा है चारों दिशा.रंग- नस्ल- जाति -धर्म के झगड़े और आदमी मारा जा रहा है . आदमी जिस प्रकार सेल्फ विनाश कर रहा है उस के लिए किसे फ़िक्र है .कोई इस बाबत क्यों चितित हो.खास तोर पर मोत कि सोदागर मल्टीनेशनल कंपनिया है. पर इनके सोने चमक के सामने कोई व्यक्ति तो छोडो देश नत -मस्तक देख रहा हूँ.एक बार फिर लिख ता हूँ LIFE IS FOR ONCE-DO NOT KILL ME
बहुत सुन्दर और कल्याणकारी सन्देश…
प्रभु कृपा से मैं घोर शाकाहारी हूँ…
इन पोस्टर और इससे संबधित पुस्तक ‘स्वर्ग कोई भी जा सकता है, बस अच्छे बनो !’ को निशुल्क मगाने और डाउनलोड करने के लिये के लिये http://www.justbegood.net/Hnd01Index.htm पर जायॆ और अनुरोध भेजें ।
धन्यवाद चिंतन, मैं इस पुस्तिका को पहले ही डाउनलोड कर चूका हूँ और बाकी सामग्री को मंगा लूँगा.
भाई अपन तो खाते क्या छूते ही नहीं हैं
और कोई खाता है तो उसे भी परेशान करते हैं
कुछ इस तरह “यार सोच तो … ये {पशु} थोड़ी देर पहले हँसता खेलता घूम रहा होगा , तब कैसा लगता होगा?? , अब कैसा लग रहा है? है ना ??”
और हाँ ये बुक तो डाऊनलोड करनी ही पड़ेगी ..
आभार
भाई निशांत का इस सन्देश के लिए
भाई चिंतन का इस दिए गए हाइपरलिंक के लिए