जापान में कुलीन व्यक्तियों का एक समूह था जिसके सदस्य साथ बैठकर सबसे अच्छी चाय पीने और वार्तालाप करने के लिए मिलते थे. समूह के सदस्य हमेशा महंगी-से-महंगी और अपने स्वाद से लुभा लेनेवाली जायकेदार चाय की खोज में लगे रहते थे.
एक बार समूह के सबसे बुजुर्ग सदस्य के ऊपर सभी सदस्यों को चाय पिलाने की बारी आई. जापान की परंपरा के अनुसार बड़े सलीके से चाय पिलाने का प्रबंध किया गया. बुजुर्ग सदस्य ने स्वर्ण पात्र से चाय निकालकर सभी को परोसी. वहां उपस्थित सभी जन चाय के अप्रतिम जायके से अभिभूत थे और उन्होंने बुजुर्ग से पूछा कि उन्हें ऐसी अद्भुत चाय कहाँ से मिली.
बुजुर्ग ने मुस्कुराते हुए कहा – “भाइयों, जिस चाय को पीकर आप इतना आनंदित हो रहे हैं उसे तो मेरे फ़ार्म के मजदूर रोज़ ही अपने घर में पीते हैं. जीवन में जो कुछ भी सबसे अच्छा है वह सर्वसुलभ है और उसे पाने के लिए कुछ खर्च नहीं करना पड़ता.
(फादर एंथोनी डी’मेलो की कहानी – A story of Father Anthony de Mello – in Hindi)


जीवन में जो सबसे अच्छा है …सर्वसुलभ है …
अच्छी चाय , रंग बिरंगे फूल , सूरज की रौशनी , चन्द्रमा की शीतलता …ये सब भी तो …
मगर फिर भी लोग असंतुष्ट ही बने रहते हैं …भागे जाते हैं अंधी दौड़ में ..
सुन्दर बोध कथा …!
बहुत सटीक!
जो सर्वसुलभ है उसका मोल ही नहीं समझ पाते हैं हम। सुन्दर, बहुत ही।
Sach hai, isi liye 5 star hotels mein dhabba aur chaupal restaurents khul gaye hein. Gareeb ke sukhe sogare amiron ka chochla ban gaye hein.
Badiya kahani,
Peace,
Desi Girl
सही कहा निशांत भाई। सहज ही सर्वत्र है।
kya baat hai – iska swaad har koee nahin janta
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