“मैं सब कुछ छोड़ने के लिए तैयार हूँ” – एक राजकुमार ने गुरु से कहा – “कृपया मुझे अपना शिष्य बना लीजिये”.
“ठीक है. लेकिन पहले तुम मुझे इस प्रश्न का उत्तर दो कि मनुष्य ज्ञान के पथ का चयन कैसे करता है?” – गुरु ने पूछा.
“त्याग के द्वारा ही हम सत्य और ज्ञान के पथ पर अग्रसर हो सकते हैं” – राजकुमार ने उत्तर दिया.
गुरु ने पास रखी टेबल को अपने पैरों से ठोकर मार दी. टेबल पर रखा एक अमूल्य फूलदान नीचे लुढ़क गया. राजकुमार उसे जमीन पर गिरने से बचाने के लिए लपका. इस प्रयास में वह बुरी तरह से गिर गया. उसने फूलदान को तो टूटने से बचा लिया लेकिन उसके हाथों में चोट लग गयी.
“अब तुम बताओ कि सच्चा त्याग किसमें है : फूलदान को टूटते हुए देखने में या इसे बचाने के लिए खुद को आहत कर लेने में?” – गुरु ने पूछा.
“मैं नहीं जानता” – राजकुमार ने कहा.
“यदि तुम यह नहीं जानते हो तो त्याग के पथ का चुनाव कैसे कर सकते हो? सच्चा त्याग इसके प्रति दुःख झेलना नहीं बल्कि उससे प्रेम करने में निहित है”.














अच्छी सीख!
शुक्रिया इसे पढ़वाने के लिये।
वाह क्या बात कही है आज ही ये सिख मै अपने बेटे को बताउंगी और उसे भी अच्छा लगेगा कहानी के जरिये मै अक्सर उसे काम लेती हूँ और वह उन बातों का हमेशा याद करता है . बहुत बहुत धन्यवाद् .
निशांत जी, यह कहानी कम समझ में आयी।
राजकुमार ने अपने हाथ की परवाह न कर फूलदान को बचा कर ठीक किया उसका आचरण और कर्म ठीक था।
अन्तर ही क्या पड़ता है कि वह गुरू के सवाल का जवाब नहीं दे पाया। उसने जवाब अपने आचरण से दिया। उसे गुरू की जरूरत नही है। वह स्वयं दूसरों को बेहतर शिक्षा दे सकता है।
कर्म के द्वारा दी गयी शिक्षा, बातों के द्वारा दी गयी शिक्षा से कहीं बेहतर है।
एक प्रेरक रचना।
पढवाने का शुक्रिया।
लाजवाब लेखन निशांत भाई। हिंदी ब्लॉगिंग में चुनिंदा लोग हैं, जो सार्थक लेखन करते हैं, सार्थक लेखन के समर्थक हैं और अपने प्रयास एक दिशा में बढ़ा रहे हैं। आपकी पोस्ट से अपने दैनिक कामकाज की शुरूआत होती है। …और हर रोज अपने लिए आत्ममंथन करने का मौका मिलता है।
interesting and inspiring
प्रवृत्ति तो वही है जो राजकुमार ने किया।
Interesting.
जो ज्ञान राजकुमार सीखने आया है – वह निवृत्ति से मिलेगा, प्रवृत्ति से नहीं।
guru kis tyag ki seekh dena chah rahe hain samajh se pare hai. yahan unmuktji se sahmat hun.
राजेन्द्र जी, राजकुमार त्याग के लिए तत्पर है लेकिन एक फूलदान को खो देना उसे गवारा नहीं है. एक प्रकार से देखें तो गुरु का फूलदान तोड़ने का प्रयास भी अनुचित है पर जैसा हिमांशु जी ने ऊपर कहा है ‘त्याग प्रवृत्ति में नहीं बल्कि निवृत्ति में है’.
ये गुरु की पवित्र मरियादा पर निर्भर करता है की हमारा मार्ग क्या होगा पर आज कल के ढोंगी बाबाओ का माया जल इतना बढ चूका है की आज ऐसे गुरु की तलाश करना भी निरर्थक है …
पर पहले की बात ही कुछ और थी आज तो हमारा मन भी क्या का क्या बना देता है तो फिर ऐसे स्थिति की तो बात ही क्या होगी पर एक अव्ह्ही कहानी के लिया धन्यवाद्!!…