चेरनोबिल के रब्बाई नाहुम को उनका पड़ोसी दुकानदार अपशब्द आदि कहकर अपमानित करता रहता था. एक समय ऐसा आया कि दुकानदार का धंधा मंदा चलने लगा.
“इसमें ज़रूर रब्बाई का हाथ है. वही ईश्वर से प्रार्थना करके अपना बदला निकाल रहा है” – उसने सोचा. फिर वह नाहुम के पास अपनी गलतियों के लिए क्षमा मांगने गया.
“मैं तुम्हें उसी भावना से क्षमा करता हूँ जिस भावना के वशीभूत होकर तुम क्षमा मांगने आये हो” – रब्बाई ने दुकानदार से कहा.
लेकिन दुकानदार का धंधा गिरता ही गया और अंततः वह बर्बाद हो गया. नाहुम के अनुयाइयों ने उससे दुकानदार के बारे में पूछा.
“मैंने उसे क्षमा कर दिया था परन्तु वह अपने मन में मेरे प्रति घृणा का पालन-पोषण करता रहा. इसके परिणामस्वरूप उसकी अच्छाई भी दूषित हो गयी और उसे मिला दंड कठोर होता गया.”
(A motivational / inspiring story about a Jew priest – in Hindi)


hamesha achche logo ki jeet hoti hai, bure khyal wale apna bura swam karate hain . isse janate uve bhi log dusaro ka bura sochate hai .
To forgive is divine .
सबसे बड़ा प्रश्न है, भूलना या क्षमा कर देना ?
बुराई करने वाला सबसे पहले अपनी ही लगाई आग मे जलता है और यही इस दुकानदार के साथ हुआ ..
जब बिना पछतावे के सिर्फ अपने लाभ के लिए क्षमा माँगी जाती है, तो यही होता है… मनुष्य हमेशा अपने किये का फल भुगतता है. यदि सच्चे मन से अपने किये का पछतावा करता तो शायद उसके साथ इतना बुरा न होता.
शिक्षाप्रद पोस्ट
aradhana जी से पूरी तरह सहमत
मेरा मानना है की प्रकृति एक हिडन कमरे से हमें देख रही है ( मतलब हमारे मन में उठ रहे भावों को भी)
The moment you truly realize your illogical actions, you do not need the formality of begging of forgivness. In fact it is you alone who can forgive yourself. If you keep on discounting others than in fact you are discounting yourself.