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क्षमा : Forgiveness

चेरनोबिल के रब्बाई नाहुम को उनका पड़ोसी दुकानदार अपशब्द आदि कहकर अपमानित करता रहता था. एक समय ऐसा आया कि दुकानदार का धंधा मंदा चलने लगा.

“इसमें ज़रूर रब्बाई का हाथ है. वही ईश्वर से प्रार्थना करके अपना बदला निकाल रहा है” – उसने सोचा. फिर वह नाहुम के पास अपनी गलतियों के लिए क्षमा मांगने गया.

“मैं तुम्हें उसी भावना से क्षमा करता हूँ जिस भावना के वशीभूत होकर तुम क्षमा मांगने आये हो” – रब्बाई ने दुकानदार से कहा.

लेकिन दुकानदार का धंधा गिरता ही गया और अंततः वह बर्बाद हो गया. नाहुम के अनुयाइयों ने उससे दुकानदार के बारे में पूछा.

“मैंने उसे क्षमा कर दिया था परन्तु वह अपने मन में मेरे प्रति घृणा का पालन-पोषण करता रहा. इसके परिणामस्वरूप उसकी अच्छाई भी दूषित हो गयी और उसे मिला दंड कठोर होता गया.”

(~_~)

The Rabbi Nahum of Chernobyl was always being insulted by a shopkeeper. One day, the latter’s business began to go badly.

“It must be the Rabbi, who is asking for God’s revenge,” he thought. He went to ask for Nahum’s forgiveness.

“I forgive you in the same spirit you ask for forgiveness.” replied the Rabbi.

But the man’s losses just kept increasing, until he was reduced to misery. Nahum’s horrified disciples went to ask him what had happened.

“I forgave him, but he continued to hate me deep down in his heart.” said the Rabbi. “Therefore, his hatred contaminated everything he did, and God’s punishment became more and more severe.”

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8 Comments Post a comment
  1. sandhya #

    hamesha achche logo ki jeet hoti hai, bure khyal wale apna bura swam karate hain . isse janate uve bhi log dusaro ka bura sochate hai .

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    June 20, 2010
  2. To forgive is divine .

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    June 20, 2010
  3. प्रवीण पाण्डेय #

    सबसे बड़ा प्रश्न है, भूलना या क्षमा कर देना ?

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    June 20, 2010
  4. बुराई करने वाला सबसे पहले अपनी ही लगाई आग मे जलता है और यही इस दुकानदार के साथ हुआ ..

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    June 21, 2010
  5. जब बिना पछतावे के सिर्फ अपने लाभ के लिए क्षमा माँगी जाती है, तो यही होता है… मनुष्य हमेशा अपने किये का फल भुगतता है. यदि सच्चे मन से अपने किये का पछतावा करता तो शायद उसके साथ इतना बुरा न होता.

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    June 21, 2010
  6. शिक्षाप्रद पोस्ट :)

    aradhana जी से पूरी तरह सहमत
    मेरा मानना है की प्रकृति एक हिडन कमरे से हमें देख रही है ( मतलब हमारे मन में उठ रहे भावों को भी)

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    June 22, 2010
  7. TUSHAR KANT PANDEYA #

    The moment you truly realize your illogical actions, you do not need the formality of begging of forgivness. In fact it is you alone who can forgive yourself. If you keep on discounting others than in fact you are discounting yourself.

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    June 22, 2010
  8. “मैं तुम्हें उसी भावना से क्षमा करता हूँ जिस भावना के वशीभूत होकर तुम क्षमा मांगने आये हो” bahut achha likha

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    April 24, 2014

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