मरू-संहिता : The Code of Desert

सहारा रेगिस्तान को पार करते हुए दो यात्रियों ने एक खानाबदोश बेदुइन की झोपड़ी को देखा और उसमें रुकने की इज़ाज़त मांगी. जैसे सभी बंजारा जातियां करतीं हैं, बेदुइन ने बहुत हर्षोल्लास से उनका स्वागत किया और उनकी दावत के लिए एक ऊँट को जिबह करके बेहतरीन भोजन परोसा.

अगले दिन दोनों यात्री तड़के ही उठ गए और उन्होंने यात्रा जारी रखने का निश्चय किया. बेदुइन उस वक़्त घर पर नहीं था इसलिए उन्होंने उसकी पत्नी को सौ दीनार दिए और अलसुबह चलने के लिए माफी मांगी. उन्होंने कहा कि ज्यादा देर करने पर सूरज चढ़ जाता और वे यात्रा नहीं कर पाते.

वे लगभग चार घंटे तक रेगिस्तान में चलते रहे जब उन्होंने किसी को पुकारते हुए सुना. उन्होंने मुड़कर देखा, बेदुइन आ रहा था. पास आने पर बेदुइन ने दीनारों की पोटली रेत पर फेंक दी. बेदुइन ने कहा – “क्या तुम लोगों को यह सोचकर शर्म नहीं आती कि मैंने कितनी ख़ुशी से तुम दोनों का अपनी झोपड़ी में स्वागत किया था!?”

यात्री आश्चर्यचकित थे. उनमें से एक ने कहा – “हमें जितना ठीक लगा उतना हमने दे दिया. इतने दीनारों में तो तुम तीन ऊँट खरीद सकते हो”.

“मैं ऊँट और दीनारों की बात नहीं कर रहा हूँ!” – बेदुइन ने कहा – “यह रेगिस्तान हमारा सब कुछ है. यह हमें हर कहीं जाने देता है और हमसे बदले में कुछ नहीं मांगता. यदि हमें इसे कुछ लौटा सकते तो हम यहाँ रहते ही क्यों? ज़िंदगी ने हमें जितना कुछ दिया है उसकी तुलना में तुम लोगों को अपनी झोपड़ी में ठहराने का मोल तो रत्ती भर भी नहीं होगा.”

(A motivational / inspirational story from the blog of Paolo Coelho – in Hindi)

Two men were crossing the desert when they saw a Bedouin’s tent and asked him for shelter. Even though he did not know them, he welcomed them in the way that the conduct of nomads dictates: a camel was killed and its meat served in a sumptuous dinner.

The next day, the two strangers woke early and decided to continue on their journey. As the Bedouin was not at home, they gave his wife a hundred dinars, apologizing for not being able to wait, because if they spent any more time there, the sun would become too strong for them to travel.

They had travelled for four hours when they heard a voice calling out to them. They looked back and saw the Bedouin following them. As soon as he caught up with them, he threw the money to the ground.

“I gave you such a warm welcome! Aren’t you ashamed of yourselves?”

In surprise, the strangers said that the camel were surely worth far more than that, but that they did not have much money.

“I am not talking about the amount,” was the answer. “The desert welcomes Bedouins wherever they go, and never asks anything in return. If we had to pay, how could we live? Welcoming you to my tent is like paying back a fraction of what life has given us.

11 Comments

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11 responses to “मरू-संहिता : The Code of Desert

  1. ज़िंदगी ने हमें जितना कुछ दिया है उसकी तुलना में तुम लोगों को अपनी झोपड़ी में ठहराने का मोल तो रत्ती भर भी नहीं होगा.”
    ” really very inspirational story”

    regards

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  2. रोचक और शिक्षाप्रद कथा ….

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  3. Akpa blog bahut hi achha hai. Mere pass shabd nahi hai tarif karne ke liye. bas itna hi kehta hu.

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  4. प्रेरक … स्मरणीय.

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  5. Amar

    Bedouin का उच्चारण हिब्रू, अरबी, फारसी, उर्दू और भारतीय भाषाओँ में बेदुइन नहीं बल्कि ‘बद्दू’ होता है. आप बद्दू शब्द गूगल में खोज कर देख लें.

    यहाँ तक की बद्दू खानाबदोश भी खुद को बद्दू ही कहते हैं न की बेदुइन.

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    • धन्यवाद. इस ओर मेरा ध्यान नहीं गया था. आम तौर पर मैं http://www.howjsay.com/ से उच्चारण जांच लेता हूँ. वहां इसका उच्चारण बेदुइन ही दिया है. यह ऐसा ही है जैसे हम एरिसटोटल को अरस्तू, अलेक्जेंडर को सिकंदर, और सोक्रेटीज़ को सुकरात कह देते हैं.

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  6. Bhoot hi yachha laga …!

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  7. sandhya

    Nishant ji namaskar , yadi hindi me type karana hai to kaise karen aur aapko bhagawan lambi umara de. dhanyawad.

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