मक्का को जानेवाले हजयात्रियों के मार्ग पर एक अंधा भिखारी बैठा भीख मांग रहा था. एक धर्मपरायण यात्री ने उसके पास आकर उससे पूछा – “बाबा, क्या यहां से गुज़रनेवाले यात्री हमारे प्यारे रसूल के फ़रमान पर अमल करते हुए मुनासिब दान दे रहे हैं?”
अंधे भिखारी ने उसे अपना टीन का कटोरा दिखाया. कटोरे में बस दो खोटे पैसे पड़े थे.
यात्री ने भिखारी से कहा – “मैं एक तख्ती पर कुछ लिखकर आपके गले में टांग देता हूं. शायद उससे आपका भला हो सके.”
शाम के वक़्त वह यात्री अंधे भिखारी से मिलने आया. भिखारी बहुत खुश था क्योंकि उसे आज तक भीख में इतने पैसे नहीं मिले थे जितने उस दिन मिल गए.
“आपने इस तख्ती पर क्या लिखा है?” – भिखारी ने यात्री से पूछा.
“मैंने सिर्फ इतना ही लिखा है – ‘आज सर्दी का खुशग़वार दिन है, सूरज अपनी रौशनी बरसा रहा है… और मैं अंधा हूं’.”
(A motivational / inspirational story about a blind beggar – in Hindi)














सुन्दर भाव
बहुत अच्छी पोस्ट है
मान गए निशांत भाई आपको
सुंदर सीख!
बहुत अच्छा
कहने कहने का तरीका है और बात बदल जाती है!!
वाकई खूब है….
bahut khub
फिर से प्रशंसनीय
शब्द बदलकर देखो, बात बदल जायेगी. बहुत अच्छा प्रसंग .
yaar mere bhai kaya khoob aapne hum sub ko seekh de hai agar sabhi ko yeh ilm hasil ho jaye to kaya baat hogi andha bhi khush aur dene wale ko swaab bhi mil gaya
maaf kijiye par mujhje is kahani ka bhav samajh nahi aaya… kya aap explain karne ki koshish karenge???
नवीन भाई, भिखारी के कहने का मतलब यह है की – ‘दुनिया में इतनी सुन्दरता और खुशियाँ बिखरी हुईं हैं पर मैं उन्हें देख नहीं सकता, मुझपर दया करो’.
dhanyawad…
apki sabhi kahaniya bht hi aache hai nishant g aap ise tarha se hme sikhate raheyage