अंधा भिखारी : A Blind Begger

the open gate

मक्का को जानेवाले हजयात्रियों के मार्ग पर एक अंधा भिखारी बैठा भीख मांग रहा था. एक धर्मपरायण यात्री ने उसके पास आकर उससे पूछा – “बाबा, क्या यहां से गुज़रनेवाले यात्री हमारे प्यारे रसूल के फ़रमान पर अमल करते हुए मुनासिब दान दे रहे हैं?”

अंधे भिखारी ने उसे अपना टीन का कटोरा दिखाया. कटोरे में बस दो खोटे पैसे पड़े थे.

यात्री ने भिखारी से कहा – “मैं एक तख्ती पर कुछ लिखकर आपके गले में टांग देता हूं. शायद उससे आपका भला हो सके.”

शाम के वक़्त वह यात्री अंधे भिखारी से मिलने आया. भिखारी बहुत खुश था क्योंकि उसे आज तक भीख में इतने पैसे नहीं मिले थे जितने उस दिन मिल गए.

“आपने इस तख्ती पर क्या लिखा है?” – भिखारी ने यात्री से पूछा.

“मैंने सिर्फ इतना ही लिखा है – ‘आज सर्दी का खुशग़वार दिन है, सूरज अपनी रौशनी बरसा रहा है… और मैं अंधा हूं’.”

(A motivational / inspirational story about a blind beggar – in Hindi)

(~_~)

A blind man was begging on the road to Mecca, when a pious Moslem came over and asked whether the people were giving generously – as the Koran commands. The man showed him his little tin, which was almost empty.

The traveller said: Let me write something on the card around your neck.

Hours later, the traveller returned. The beggar was surprised, for he had received a large amount of money.

– What did you write on the card? – he asked.

– All I wrote was: “Today is a beautiful spring day, the sun is shining, and I am blind.”

Comments

  1. sameer says

    yaar mere bhai kaya khoob aapne hum sub ko seekh de hai agar sabhi ko yeh ilm hasil ho jaye to kaya baat hogi andha bhi khush aur dene wale ko swaab bhi mil gaya

    • says

      नवीन भाई, भिखारी के कहने का मतलब यह है की – ‘दुनिया में इतनी सुन्दरता और खुशियाँ बिखरी हुईं हैं पर मैं उन्हें देख नहीं सकता, मुझपर दया करो’.

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