कोई बिरला विष खाता है!
मधु पीने वाले बहुतेरे,
और सुधा के भक्त घनेरे,
गज भर की छातीवाला ही विष को अपनाता है!
कोई बिरला विष खाता है!
पी लेना तो है ही दुष्कर,
पा जाना उसका दुष्करतर,
बडा भाग्य होता है तब विष जीवन में आता है!
कोई बिरला विष खाता है!
स्वर्ग सुधा का है अधिकारी,
कितनी उसकी कीमत भारी!
किंतु कभी विष-मूल्य अमृत से ज्यादा पड़ जाता है!
कोई बिरला विष खाता है!
(A poem of Harivansh Rai Bachchan)



बहुत सुन्दर..आभार इस प्रस्तुति का.
किंतु कभी विष-मूल्य अमृत से ज्यादा पड़ जाता है!
कोई बिरला विष खाता है!
…….sach mein we birla hi hota hain jo chupchap bishpaan karta hai…
bahut gahre bhav.. sundar prastuti ke liye dhanyavaad…
गहन चिन्तनीय अर्थ । विषपान को मानवता पर उपकार की संज्ञा मिलती रही है ।
peda me anand jise ho aaye meri madhushala
bhut sundar