
इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।
एक चिंगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तों,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।
एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।
एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।
निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है।
दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।
- दुष्यंत कुमार
(A ghazal / Urdu poem of Dushyant Kumar – in Hindi)

बहुत खूब जनाब
bahut badhiyaa geet hai. bahut sunadar!
BAHUT BAHUT BAHUT AABHAAR IS ADWITEEY GAZAL KO PADHWANE KE LIYE……
Bahut achi gazal hai. wakai achi lagi.
Shuaib
padhkar ek tees se uthi. abhar
तब मैं साहित्य का नहीं, विज्ञान का विद्यार्थी था। पहली बार दुष्यंत कुमार का नाम पता चला जब ग्वालियर में श्रीमती अंजना मिश्र ने ‘दुष्यंत जयंती’ मनाई। मैं और मेरे साथी दुष्यंत को शकुंतला वाला दुष्यंत समझे थे। फिर ‘साये में धूप’ हाथ आयी और एक सिलसिला चल पड़ा। कई गजलों को लयबध्द करके गाया भी। जुमले की तरह दुष्यंत की पंक्तियों का जमकर इस्तेमाल भी किया। एक-दो वर्ष बाद पत्रकारिता करते हुए दुष्यंत पर अग्रलेख डॉ. राम विद्रोही जी के सम्पादन में प्रकाशित दैनिक आचरण में प्रकाशित हुआ।
दुष्यंत : सामाजिक पीड़ा की प्रखर अनुभूति
रामकुमार सिंह/ 1 सितम्बर, सन 2000/दैनिक आचरण (ग्वालियर/सागर)/सन्दर्भ : ‘साये में धूप : दुष्यंत कुमार त्यागी/राधाकृष्ण प्रकाशन – सन् 1975
बिना कोई परिवर्तन किये आज ज्यों का त्यों रिलीज कर रहा हूँ………………….कृपया ‘सर्जना’ पर पधारें।
-डॉ. रामकुमार सिंह
Gazal jindgi ke bahut kareeb lagi.
dushyant ji ne apni rachnao k dwara aam admi ki har pida ko ujagar kiya hai .unki kritiya apne aap me anupam hai.
dush;ant adbhut he. ve bharat ki pida ko likhne ki itni urja kgan se laye. sha;ad god ne unse yh sab likhvaya he.
inki gazlo me kuchh baat he aur kisi me nahi. Patthar me jaan daal dein ye gazal
sir apke fan ho gaye