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साहिर लुधियानवी का एक किस्सा

Sahir_Ludhianvi,_(1921-80)शायद ही ऐसा कोई उर्दू शायरी का दीवाना और पुराने फिल्मी गीतों का प्रेमी होगा जो साहिर लुधियानवी के नाम से अपरिचित होगा. उन्होंने बेहतरीन गज़लें, नज़्में, और फिल्मी गीत लिखे जिन्हें लोग आज भी गाते-गुनगुनाते हैं.

बंबई फिल्म जगत में आने से पहले साहिर लाहौर में रहते थे. वहां के साहित्यिक क्षेत्र में उनका बड़ा नाम था लेकिन बहुत से शायरों की मानिंद उनकी माली हालत भी कभी अच्छी नहीं रही.

लाहौर से साहिर ‘साक़ी’ नामक एक मासिक उर्दू पत्रिका निकाला करते थे. साधन सीमित होने के कारण पत्रिका घाटे में चल रही थी. साहिर की हमेशा यह यह कोशिश रहती थी कि कम ही क्यों न हो लेकिन लेखक को उसका पारिश्रमिक ज़रूर दिया जाए.

एक बार वे किसी भी लेखक को समय पर पैसे नहीं भेज सके. ग़ज़लकार शमा ‘लाहौरी’ को पैसे की सख्त ज़रूरत थी. वे तेज ठंड में कांपते हुए साहिर के घर पहुंचे और दो ग़ज़लों के पैसे मांगे.

साहिर उन्हें बड़ी इज्ज़त से अंदर ले गए. उन्होंने शमा को अपने हाथों से बनाकर गर्म चाय पिलाई. जब शमा को ठंड से थोड़ी राहत मिली तो साहिर अपनी कुर्सी से उठे. उन्होंने खूंटी पर टंगा हुआ अपना महंगा कोट उतारा जिसे उनके एक चहेते ने कुछ दिनों पहले ही तोहफ़े में दिया था.

कोट को युवा शायर के हाथों में सौंपते हुए साहिर ने कहा – “मेरे भाई, बुरा न मानना लेकिन इस बार नक़द के बदले जिंस में पारिश्रमिक दिया जा रहा है.”

युवा शायर की आंखें नम हो गईं. वे कुछ भी न बोल सके.

‘सर्वोत्तम’ (हिंदी रीडर्स डाइजेस्ट) के बहुत पुराने अंक से साभार
चित्र साभार – विकीपीडिया

(A motivational / inspirational anecdote of Sahir Ludhiyanavi – in Hindi)

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11 Comments Post a comment
  1. सुन्दर!

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    October 5, 2009
  2. nice

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    October 5, 2009
  3. शुक्रिया ये पढ़वाने के लिए

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    October 5, 2009
  4. मार्मिक प्रसंग.

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    October 5, 2009
  5. That was a nice lesson to learn. Thanks for posting it.

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    October 5, 2009
  6. हम तो साहिर के पक्के वाले फेन है जी …

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    October 5, 2009
  7. साहिर लुधियानवी को सलाम है.
    उनकी लेखनी को सलाम है.

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    October 20, 2009
  8. achha laga

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    October 20, 2009
  9. rafat alam #

    साहिर साब का एक शेर लिखूं
    दुनिया ने तजुर्बात ओ हवादिस की शक्ल में /जों कुछ मुझे दिया है लोटा रहा हूँ मैं .
    दो शाएर ,दोनों तंगहाल, दोनों को पैसे की ज़रूरत .मनोस्थाति क्या रही होगी दोनों की सोचए -देने वाले ने पैसे के स्थान पर जिंस(वस्तु)प्रस्तुत की .लेने वाला क्या बोलता आंख नम करने के सिवा .सवेदनशीलता का सुंदर और मार्मिक बयान प्रसंग में किया है.आपको साधुवाद.

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    September 4, 2010
  10. SUBHASH KAUSHIK #

    realy tuching

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    October 14, 2010
  11. paras nath keshari #

    kuchh nahi bas ankh bhar aaii hai.

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    April 5, 2012

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