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नास्तिक प्रोफेसर और विद्यार्थी के मध्य संवाद : An Atheist Professor and His Student

2946205825_0bbd4dceacएक नास्तिक प्रोफेसर और विद्यार्थी के मध्य ईश्वर के अस्तित्व और विज्ञान के बारे में एक दिन कक्षा में वार्तालाप हुआ.

प्रोफेसर ने अपने नए विद्यार्थी को खड़ा होने के लिए कहा और उससे पूछा :-

प्रोफेसर – क्या तुम ईश्वर में विश्वास करते हो?

विद्यार्थी – हां सर.

प्रोफेसर – क्या ईश्वर शुभ है?

विद्यार्थी – जी सर.

प्रोफेसर – क्या ईश्वर सर्वशक्तिमान है?

विद्यार्थी – जी है.

प्रोफेसर – पिछले साल मेरे भाई की मृत्यु कैंसर से हो गई जबकि वह अंत तक ईश्वर से अच्छा होने की प्रार्थना करता रहा. हममें से बहुत से लोग ईश्वर से ऐसी ही प्रार्थना करते रहते हैं लेकिन ईश्वर कुछ नहीं करता. ऐसा ईश्वर अच्छा कैसे हो सकता है? बताओ.

(विद्यार्थी कुछ नहीं कहता)

प्रोफेसर – लगता है तुम्हारे पास इस बात का कोई जवाब नहीं है. चलो हम आगे बढ़ते हैं. मुझे बताओ, क्या ईश्वर अच्छा है?

विद्यार्थी – जी, है.

प्रोफेसर – और क्या शैतान भी अच्छा है?

विद्यार्थी – नहीं.

प्रोफेसर – लेकिन कहा जाता है कि सब कुछ ईश्वर से ही उत्पन्न हुआ है. तो फिर शैतान कहां से आया?

विद्यार्थी – जी… ईश्वर से.

प्रोफेसर – ठीक है. तो अब तुम मुझे बताओ, क्या संसार में बुराइयां हैं?

विद्यार्थी – जी, हैं.

प्रोफेसर – हां. बुराइयां हर तरफ हैं. और तुम्हारे अनुसार ईश्वर ने सब कुछ बनाया है न?

विद्यार्थी – जी.

प्रोफेसर – तो बुराइयां किसने बनाई हैं?

(विद्यार्थी कुछ नहीं बोलता)

प्रोफेसर – संसार में बीमारी, भुखमरी, युद्ध, अराजकता है. ये सभी और दूसरी बहुत सी बुराइयां संसार में हैं न?

विद्यार्थी – जी, हैं.

प्रोफेसर – इन बुराइयों को किसने बनाया है?

(विद्यार्थी कुछ नहीं कहता)

प्रोफेसर – विज्ञान कहता है कि हम अपनी पांच ज्ञानेंद्रियों से सभी प्रकार का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं. मुझे बताओ, क्या तुमने ईश्वर को कभी देखा है?

विद्यार्थी – नहीं.

प्रोफेसर – क्या तुमने ईश्वर की आवाज़ सुनी है?

विद्यार्थी – नहीं सर.

प्रोफेसर – क्या तुमने कभी ईश्वर का स्पर्श किया, उसका स्वाद या सुगंध लिया? क्या तुम्हें ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव हुआ?

विद्यार्थी – नहीं सर. ऐसा कभी नहीं हुआ.

प्रोफेसर – फिर भी तुम उसमें आस्था रखते हो!

विद्यार्थी – … जी.

प्रोफेसर – लेकिन विज्ञान के अनुसार तुम्हारे ईश्वर के अस्तित्व का कोई वैधानिक, तर्कसंगत, अनुभवाधारित कोई प्रमाण नहीं है. इस बारे में तुम क्या कहोगे?

विद्यार्थी – कुछ नहीं. मुझे केवल अपनी आस्था पर विश्वास है.

प्रोफेसर – बहुत खूब! लेकिन विज्ञान तुम्हारी इस कोरी आस्था को दो कौड़ी की भी नहीं मानता.

विद्यार्थी – मैं जानता हूं, सर. क्या मैं आपसे कुछ प्रश्न कर सकता हूं?

प्रोफेसर – हां, पूछो क्या पूछना चाहते हो.

विद्यार्थी – क्या ठंडा या ठंड जैसा कुछ वास्तव में होता है?

प्रोफेसर – हां, इसमें क्या संदेह है!

विद्यार्थी – नहीं सर. आप गलत कह रहे हैं.

(कक्षा में अब गहन शांति छा जाती है)

प्रोफेसर – क्या? तुम कहना क्या चाहते हो?

विद्यार्थी – सर, ऊष्मा या ताप कम या अधिक हो सकता है – जैसे निम्नताप, उच्चताप, चरमताप, परमताप, या फिर शून्य ताप आदि. लेकिन ठंड जैसा कुछ नहीं होता. हम शून्य से 273 डिग्री नीचे के तापमान को छू सकते हैं जब कोई ऊष्मा नहीं होती पर उससे नीचे नहीं जा सकते. ठंड जैसा कुछ नहीं होता. ठंड केवल एक शब्द है जिससे हम ताप की अनुपस्थति को वर्णित करते हैं. हम ठंड को नहीं माप सकते. ताप ऊर्जा है. ठंड ताप के ठीक विपरीत नहीं है बल्कि उसकी अनुपस्थिति है.

(कक्षा में सभी इस बात को समझने का प्रयास करने लगते हैं)

विद्यार्थी – और अंधकार क्या है, सर? क्या अंधकार जैसी कोई चीज होती है?

प्रोफेसर – यदि अंधकार नहीं होता तो भला रात क्या होती है?

विद्यार्थी – आप गलत कह रहे हैं, सर. अंधकार भी किसी चीज की अनुपस्थिति ही है. प्रकाश कम या अधिक हो सकता है, मंद या चौंधियाता हुआ हो सकता है, झिलमिलाता या लुपलुपाता हो सकता है, लेकिन यदि प्रकाश का कोई स्रोत नहीं हो वह अवस्था अंधकार की होती है. नहीं क्या? वास्तव में अंधकार का कोई अस्तित्व नहीं होता. यदि ऐसा होता तो हम अंधकार को और अधिक गहरा बना पाते, जैसा हम प्रकाश का साथ कर सकते हैं.eye-of-god

प्रोफेसर – मैं समझ नहीं पा रहा कि तुम क्या साबित करना चाहते हो?

विद्यार्थी – मैं यह कहना चाहता हूं कि आपका दृष्टिकोण दोषपूर्ण है.

प्रोफेसर – दोषपूर्ण! तुम ऐसा कैसे कह सकते हो?

विद्यार्थी – आप द्वैत की अवधारणा को मान रहे हैं. आप कह रहे हैं कि जिस प्रकार जीवन और मृत्यु हैं उसी प्रकार अच्छा और बुरा ईश्वर होता है. आप ईश्वर की धारणा को सीमित रूप में ले रहे हैं… वह जिसे आप माप सकते हैं. क्या आप जानते हैं कि विज्ञान इसकी व्याख्या तक नहीं कर सकता कि विचार क्या होता है. आप विद्युत और चुंबकत्व के प्रयोग करते हैं लेकिन आपने इन्हें न तो देखा है और न ही इनको पूरी तरह से जान पाए हैं. आप मृत्यु को जीवन के ठीक विलोम के रूप में देखते हैं जबकि मृत्यु का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, वह जो जीवन की अनुपस्थिति मात्र है.

अब आप मुझे बताएं सर, क्या आप अपने छात्रों को यह नहीं बताते कि मनुष्यों की उत्पत्ति वानरों से हुई है?

प्रोफेसर – यदि तुम्हारा आशय प्राकृतिक विकासवाद की प्रक्रिया से है तो… हाँ बताता हूँ.

विद्यार्थी – क्या आपने अपनी आँखों से इस विकास की प्रक्रिया को घटते देखा है?

(प्रोफेसर मुस्कुराते हुए अपना सर न की मुद्रा में हिलाता है, वह समझ गया है कि यह बहस किस दिशा में जा रही है)

विद्यार्थी – चूंकि आज तक किसी ने भी विकास की प्रक्रिया को घटते हुए नहीं देखा है और किसी ने यह सिद्ध भी नहीं किया है कि यह प्रक्रिया अनवरत है, क्या फिर भी आप इसे अपने छात्रों को दावे से नहीं पढाते हैं? ऐसा है तो आप वैज्ञानिक में और एक उपदेशक में कोई फर्क रह जाता है?

(कक्षा में खुसरफुसर होने लगती है)

विद्यार्थी – (ऊंचे स्वर में) क्या कक्षा में कोई ऐसा है जिसने प्रोफेसर का मष्तिष्क देखा हो?

(सारे विद्यार्थी हंसने लगते हैं)

विद्यार्थी – क्या यहाँ कोई है जिसने प्रोफेसर के मष्तिष्क को सुना हो, छुआ हो, सूंघा, चखा, या अनुभव किया हो?

शायद यहाँ ऐसा कोई नहीं है. इस प्रकार, विज्ञान के स्थापित मानदंडों के अनुसार मैं यह कह सकता हूँ सर कि आपके दिमाग नहीं है. मेरी बात का बुरा न मानें सर, लेकिन यदि आपके दिमाग ही नहीं है तो हम आपकी शिक्षाओं पर कैसे भरोसा कर लें?

(कक्षा में शांति छा जाती है. प्रोफेसर विद्यार्थी की ओर टकटकी लगाए देखते हैं. उनका चेहरा गहन सोच में डूबा है)

प्रोफेसर – कैसी बातें करते हो! यह तो हम अपने विश्वास से जानते ही हैं.

विद्यार्थी – वही तो मैं भी कहना चाहता हूँ सर कि मनुष्य और ईश्वर को जोड़नेवाली कड़ी आस्था ही है. यही सभी चर-अचर को गतिमान रखती है.

* * * * * * * * * * * * * * * * * * * *

ऊपर दिया गया संवाद इन्टरनेट पर चैन ई-मेल के रूप में सालों से घूम रहा है. कहा जाता है कि उस विद्यार्थी का नाम ए पी जे अबुल कलाम था, लेकिन ऐसा दावे से नहीं कहा जा सकता.

आप इस बारे में क्या सोचते हैं? आपकी दृष्टि में कौन सही है? क्या आपको प्रोफेसर की तर्कशीलता प्रभावित करती है या विद्यार्थी की निपट आस्था लुभाती है?

(A motivational / inspirational dialogues between an atheist professor and his believer student – in Hindi)

(~_~)

An Atheist Professor of Philosophy was speaking to his Class on the Problem Science has with GOD , the ALMIGHTY. He asked one of his New Students to stand and . . .

Professor :Do you Believe in GOD ?
Student : Absolutely, sir.
Professor : Is GOD Good ?
Student : Sure.
Professor : Is GOD ALL – POWERFUL ?
Student : Yes.
Professor : My Brother died of Cancer even though he prayed to GOD to heal him. Most of us would attempt to help others who are ill. But GOD didn’t. How is this GOD good then? Hmm?

(Student was silent )

Professor : You can’t answer, can you ? Let’s start again, Young man. Is GOD Good?
Student : Yes.
Professor : Is Satan good ?
Student : No.
Professor : Where does Satan come from ?
Student : From . . . GOD . . .
Professor : That’s right. Tell me son, is there evil in this world?
Student : Yes.
Professor : Evil is everywhere, isn’t it ? And GOD did make everything.
Correct?
Student : Yes.
Professor : So who created evil ?

(Student did not answer)

Professor : Is there Sickness? Immorality? Hatred? Ugliness? All these terrible things exist in the world, don’t they?
Student : Yes, sir.
Professor : So, who created them ?

(Student had no answer)

Professor : Science says you have 5 senses you use to identify and observe the world around you. Tell me, son . . . Have you ever seen GOD?
Student : No, sir.
Professor : Tell us if you have ever heard your GOD?
Student : No , sir.
Professor : Have you ever felt your GOD, tasted your GOD , smelt your GOD ? Have you ever had any sensory perception of GOD for that matter?
Student : No, sir. I’m afraid I haven’t.
Professor : Yet you still believe in HIM?
Student : Yes.
Professor : According to empirical, testable, demonstrable protocol, science says your GOD doesn’t exist. What do you say to that, son?
Student : Nothing. I only have my faith.
Professor : Yes, faith. And that is the problem science has.

Student asks and professor answers

Student : Professor, is there such a thing as heat?
Professor : Yes.
Student : And is there such a thing as cold?
Professor : Yes.
Student : No, sir. There isn’t, 

(The Lecture Theatre became very quiet with this turn of events )

Student : Sir, you can have lots of heat, even more heat, superheat, red hot, white hot, a little heat or no heat. But we don’t have anything called cold. We can hit 458 degrees below zero which is no heat, but we can’t go any further after that. There is no such thing as cold. Cold is only a word we use to describe the absence of heat. We cannot measure cold. Heat is energy. Cold is not the opposite of heat, sir, just the absence of it.

(There was pin-drop silence in the Lecture Theatre )

Student : What about darkness, Professor? Is there such a thing as darkness?
Professor : Yes. What is night if there isn’t darkness?
Student : You’re wrong again, sir. Darkness is the absence of something. You can have low light, normal light, bright light, flashing light . . but if you have no light constantly, you have nothing and its called darkness, isn’t it? In reality, darkness isn’t. If it is, you would be able to make darkness darker, wouldn’t you?

Professor : So what is the point you are making, Young Man ?
Student : Sir, my point is your Philosophical premise is flawed.
Professor : Flawed ? Can you explain how?
Student : Sir, you are working on the premise of duality. You argue there is life and then there is death, a Good GOD and a Bad GOD. You are viewing the concept of GOD as something finite, something we can measure. Sir, science can’t even explain a thought. It uses electricity and magnetism, but has never seen, much less fully understood either one. To view death as the opposite of life is to be ignorant of the fact that death cannot exist as a substantive thing. Death is not the opposite of life: just the absence of it. Now tell me, Professor, do you teach your students that they evolved from a monkey?
Professor : If you are referring to the natural evolutionary process, yes, of course, I do.

Student : Have you ever observed evolution with your own eyes, sir?

(The Professor shook his head with a smile, beginning to realize where the argument was going)

Student : Since no one has ever observed the process of evolution at work and cannot even prove that this process is an on-going endeavour, are you not teaching your opinion, sir? Are you not a scientist but a preacher?

(The class was in uproar )

Student : Is there anyone in the class who has ever seen the professor’s brain?

(The class broke out into laughter)

Student : Is there anyone here who has ever heard the Professor’s brain, felt it, touched or smelt it? . . .No one appears to have done so. So, according to the established rules of empirical, stable, demonstrable protocol, Science says that you have no brain, sir. With all due respect, sir, how do we then trust your lectures,sir?

(The room was silent. The Professor stared at the student, his face unfathomable)

Professor : I guess you’ll have to take them on faith, son.
Student : That is it sir . . . exactly ! The link between MAN & GOD is FAITH. That is all that keeps things alive and moving.

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46 Comments Post a comment
  1. इसे श्रद्धा कहते हैं – जो मानव से न जाने कैसे अनूठे कर्म करा देती है – यहाँ तक कि ईश्वर का सृजन भी।

    मनुष्य यहीं महान हो जाता है,बन्धु

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    July 26, 2009
  2. वैसे तो आपका ब्लॉग प्रतिदिन देखती /पढ़ती हूँ , पर आज की कथा मुझे ज्यादा ही अच्छी लगी ..जबकि मैं नास्तिक हूँ .धन्यवाद इस प्रेरक प्रसंग के लिए.

    लवली

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    July 26, 2009
  3. उन्मुक्त #

    पर विकासवाद के सबूत हैं। व्यक्ति के मस्तिष्क होता है इसके भी सबूत हैं। शायद यही दोनो में अन्तर है।

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    July 26, 2009
  4. संगीता पुरी #

    विज्ञान का नियम तबतक चलता रहता है .. जब तक इसे कोई काट न दे .. इसके विपरीत आस्‍था का नियम तबतक नहीं माना जाता ..जबतक कोई प्रमाणित न कर दे .. दोनो में यही मुख्‍य अंतर है।

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    July 26, 2009
  5. रोचक!

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    July 26, 2009
  6. dinesh #

    ishvar ke hone na hone se farak kya padata hai.

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    July 26, 2009
  7. Mera comment to beech men he koi le uda- Mujhe post bahut achhi lagi -Jeevan ke anekon samvedanaon ka koi tark nahin hota – Kutarki se apna sar kyon kphapaayen

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    July 26, 2009
  8. Machine ka kya kiya jaye

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    July 26, 2009
  9. मुझे तो विद्यार्थी की निपट आस्था ही लुभाती है । इस प्रस्तुति का आभार ।

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    July 26, 2009
  10. Ankush #

    himanshu ji se purnatah sahamat…
    aur sangita puri ji ne bhi kya khub kahi hai…

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    July 27, 2009
  11. Vaibhav Dixit #

    मुझे भी विद्यार्थी की आस्था ही प्रेरित करती है, इस संवाद को हर बार उतने ही आनंद से पड़ता हूँ, जैसा पहली बार पढ़ा था|

    धन्यवाद, इसको स्थान देने के लिए|

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    July 27, 2009
  12. Rochak.

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    July 27, 2009
  13. Nishant Jee
    Pahle shama chahunga, ki apke blog par pahle nahi aa saka. Jahan tak Ishwar ke hone ki baat hai, wo hai aur rahega, isme mujhe tanik bhi sandeh nahi hai.
    Manushya buddhi apni apni tarah kaam karti hai, aur Ishwar ke hone ya na hone par tark vitark karti hai, Jabki wo samabh hai nahi hai.
    Age bhi apke blog jarroor dekoonga .
    Prabhat Sardwal

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    July 28, 2009
  14. K M Mishra #

    Sir G shandaar Pahal hai internet par apki.
    Ek Riktata thi jis aap bhar rahe hein.

    Jai ho.

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    July 30, 2009
  15. K M Mishra #

    Ek sawal hai.
    Apka server wordpress hai lekin aap .com kaise lagate hain.

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    July 30, 2009
    • मिश्राजी, मैंने वर्डप्रेस से 15 डॉलर सालाना कीमत पर अपना ब्लौग अपने डोमेन hindizen.com पर बनाया है. कोई भी ऐसा कर सकता है. अपने डोमेन पर बने ब्लौगों के कई लाभ हैं, हांलाकि उन्हें नियमित बनाए और चलाये रखने में ज्यादा श्रम करना पड़ता है.

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      July 30, 2009
  16. K M Mishra #

    kabhi “सुदर्शन”
    (हास्य व्यंग्य पर आधारित ब्लॉग) ki taraf bhi Ghoomate huye padhariye. Apka Swagat hai.

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    July 30, 2009
  17. निशांत यह कहानी कई साल से घूम रही है वैसी ही एक कहानी आत्मा के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिये है जिसमे एक काँच के भीतर से मरते हुए आदमी की आत्मा काँच तोडकर निकल जाती है . ( यह प्रयोग कहीं भी रजिस्टर्ड नही है) इन सारे तर्कों के विग्यान के पास उत्तर है अत: इसे कहानी की तरह ही लिया जाये तो मज़ा आयेगा .

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    July 31, 2009
  18. anchal #

    nishant ji, vidyarthi me nipat astha nahi uske dristikon me vyapkta hai. ise nipat astha kahna mujhe nahi lagta sahi hoga.

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    August 23, 2009
    • अंचल जी, गहरे अर्थों में मैं विद्यार्थी से सहमत नहीं हूँ. इसका कारण देने के लिए यह स्थान उपयुक्त नहीं है.

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      August 23, 2009
      • neeti #

        Tarksheelta zarrori hai phir chahe wo astha ke bare me hi kyo na ho. Vidyarthi ke shuru ke tark ye darshane ke liye teekh they ki bhagwan pe astha ka matlam jeevan ki vishamtaon ko bahgwan ke bhale bure hone se nahi hai. Lekin baad ke tark to sirf professor saab ki khilli udane ke liye kiye gaye lagte hain. vigyan ka har vidyarthi janta hai ki vahi theory mani jaati hai jo proven ho, khud prove kar saken , jiski khud jaanch kar sakein vidyarhi, aur vigyan isi prakar aage badta hai chahe evolution ki baat ho, ya dimag hone na hone ki.

        Bhagwan pe andh vishwas apne karmon ko nazarandaaz karke, bhi bura hai, ya bhagwan ke vishwas ko jeevan ki har sukh suvidha se jodna ya ye sochna ki agar dukh mila to vah apne karmon ki vajah se nahi balki bhagwan ke prakop ke karan ya bhagwan saath hain to koi gham, dukh, dard- mrityu kabhi pas nahi phatkegi. Bhagwan pe astha swayam me astha ka doosra naam hai, man ko har paristhiti me sthir rakhne ka upay hai.

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        October 5, 2009
  19. padam #

    nitiji ki bat mai dam hai.vidyarthi ke tark se mai sahmat nahi hoon.andhkar,thandapan ya mastisk ko siddh karna or ishvar ko siddh karna ek jaisa nahi hai . andhkar pratyaks hai.

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    October 22, 2009
  20. दिनेश की टिपण्णी से असहमत.

    ईश्वर के होने या न होने का उन लोगों पर तो जरूर असर पड़ता है जिन्होंने आस्तिकता या नास्तिकता की दुकाने खोल रखीं हैं.

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    October 26, 2009
  21. भाई जी,
    ना तो वह गरीब प्रोफ़ेसर कोई सुलझा और तार्किक वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला व्यक्ति लगता है, क्योंकि वह सही रूप से तर्क कर ही नहीं रहा और ना ही पूछे गये तार्किक प्रश्नों के सही जवाब उसके पास थे ( यह इसके बाबजूद कि हम जानते हैं कि हालांकि यहां दोनों तरफ़ के संभावित तर्क वही आस्तिक कहानीकार लिख रहा है जिसने कि यह संवाद लिखा है)।

    ना ही वह विद्यार्थी निपट आस्थावान लगता है, क्योंकि वह आस्था को तर्कों के सहारे सिद्ध करने का प्रयत्न कर रहा है, जबकि निपट आस्था को इसकी कोई जरूरत महसूस नहीं होती।( यह अलग बात है कि उसके तर्क कितने खोखले हैं, पर जाहिरा तौर पर कहानीकार प्रोफ़ेसर को इनसे भी खोखला साबित करना चाह रहा है)

    तर्क और आस्था का कैसा मिलान।

    दो निपट अधूरे लोगों के संवाद से आधे-अधूरे निष्कर्ष ही प्राप्त हो सकते हैं।

    यह बहुत पुरानी तर्क पद्धति है। सिर्फ़ मज़ा लिया जा सकता है।

    शुक्रिया।

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    October 27, 2009
  22. akash #

    agar mai apne proffessor se itna bolunga to woh mera practical back kar dega.. hahaha,
    anyway, i believe in adwaitwaad, so there is only non dualness.

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    March 1, 2010
  23. अच्छा लगा यहाँ आ कर :)

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    June 26, 2010
  24. anoop tiwari #

    it’s very motivational story…i go with student…

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    August 31, 2010
  25. prasad #

    aapka blog bahut badiya hain. prasad ap

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    October 16, 2010
  26. sir kya adimanav ka nirmaan kaise huva, muje hindi magzine chayeeye. kaise sampark kare. muje aapka blog bahut pasand aayaa. muje aur naasthikatha ke baare mein janana hain. science ke bare mein jankari praft karni hain. thank u sir. prasad. andhra pradesh.

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    October 21, 2010
  27. मैं एक नास्तिक हूँ और इसे पढ़ने से मैं जरा भी प्रभावित नहीं हुआ. जो चीज हम नहीं जानते हुए भी मानते हैं वो अंध विस्वाश कहलाता है, जो गलत भी हो सकता है और सही भी. चीजों के ना होते हुए भी उसे मांनना इश्वर के अस्तित्व को साबित नहीं करता.

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    March 18, 2011
    • vishal shresth #

      manyawer
      apke astha ya viswash pe koi thes pahuchana hmara maksad nahi, apki swatantra ka samman karte hue kuch kehna chaunga
      bhagwan ki bat main nahi karunga, yaha dharam sastro ki bat kahta hu
      sastro may(scietist ne bhi mana)hazaro sal pehle hi 365.625 days a year wernit hai,yog kala, pak kala aur kamsutra ki pustake kasthya panno pe hazaro sal pehle likhi gayi tha(scientist ne mana)
      aayurved ki charak sanhita aur rigwed pe sakro salo se amerikan aur jerman sahit sara viswwa research kar rahamakar sankranti n viswakarma pooja ki tithi kavi nahi badlati,,leep yaer may bhi nahi, 14 jan 17 sep,
      yog pustak ki dhyan mudra ko scientisto ne bhi mana
      blood presure ki upayo ko mbbs dharalle se likhte hai
      sankh,dhoop batti ghanta se aese jeewanoo v mar jate hai jinhe ham dekh nahi pate,,,scientisto na kaha,,
      gay ka gobar se ham aagan lepte hai,, scientisto ne kaha ki kewal gay ka gobar hi vishanuoo ko marta hai, baki sab gobar dushit hota hai, aur iske uple ka dhua bhi kafi prabhav kari hai,
      gay mutra jo ki vedo may amrit mana jata hai,,,ab scientist uspe khoj karke dawa bech rahe hai,,,ved ne aur kisi ke bhi mutra ko kharab mana hai,
      mahbaharat kal may…jaha gandhar tha waha kandhar, jaha dhar nagri tha, waha aaj dharan, jaha virat nagar tha , waha aaj birat nagar, jaha magadh tha aaj bhi magahd, jaha sumeru aur hindukush parbat tha aaj v hai, himalya aaj bhi wahi, kuruchetra ki ajo akchansiya sthiti mahabaharat may vernit hai, wahi kuru chetra,jaha indraprstha hai waha delhi (rajdhani tab v aaj b)
      ramayan rawan ki lanka…sri lanka
      nasa ki scientisto ne ram setu bhi khoj nikala.. are wahi jise vanar sena ne banaya tha,
      yamuna aaj bhi kali hai kali…
      saraawati gayab hojayegi ye vedo may ullekh tha,, lo gayab ho gayi
      0 hamne us kal may hi use krna suru kar diya tha jise bad may bharat ke hi ramanuj ji ne khoja apke liye.
      aur ye sab bate main nahi,,,apka science kehta hai
      dhanyawad

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      July 6, 2012
  28. C.L.Joshi #

    If some people are earning by spreading LUST or terror to the people in different religions and languages in the name of GOD, let them do so.
    One should pity them( pity to both , giver and taker).
    Further ,they are earning by selling good thing and not by selling wine or tobacco or drugs which are harmful to society.
    Believers and nonbelievers both are dying since centuries, without any
    difference to world or themselves.
    The discussion is helpful for updating knowledge.

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    April 13, 2011
  29. sam #

    student and guru dono ke pas hi simit knowlege hai. isliye koi uttar dono ko nai sujh raha tha.

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    September 30, 2011
  30. यह तो पौराणिक कहानी के किस्म का है। ऐसी कई काल्पनिक कथाएँ गुजरी हैं सामने से। समय ने जब यहाँ कुछ कह दिय तब तो कुछ कहना बाकी ही नहीं रहा। हालांकि मुझे कलाम की आत्मकथा में ईश्वर की पक्षधरताअ जम कर दिखी थी। सिर्फ़ एक बात कहनी है कि ठंढ-अंधकार सारे मनुष्य को एक जैसे दिखते हैं यानी महसूस हो सकते हैं धर्म-ईश्वर नहीं। विद्यार्थी के सवालों या तर्कों के सही जवाब प्रोफ़ेसर नहीं दे पाया है। समय ने सब कुछ कह दिया है। विद्युत से लेकर सब कुछ, साबित हो सकता है, हर व्यक्ति को महसूस कराया जा सकता है, इन सबके भौतिक प्रभाव को किसी को दिखाया जा सकता है, ईश्वर का कुछ भी भौतिक नहीं…विचार या चेतना की व्याख्या, दूर नहीं, हमारे समय ने ही अपने चिट्ठे पर सुन्दरता और गम्भीरता के साथ कर दी है।

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    October 1, 2011
  31. om mahala #

    आप ने कभी माचिस की तीली में आग देखि ह नहीं न फिर भी हम सभी विसवास के साथ कहा सकते ह की इसमे आग ह उसी प्रकार भगवान भी ह

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    October 5, 2011
  32. rochean PANDEY #

    अगर हम संवाद को देखें तो इसके दो भाग नज़र आते हैं कहानी से लगता है कि कथाकार अपनी काल्पनिकता से आस्तिकता को सही ठहराना चाह रहा है॥अगर आप दूसरे भाग को पहले लिख दें तो ऐसा लग जाएगा कि कथाकार नास्तिक है और अपनी नास्तिकता को सही ठहराना चाह रहा है।वास्तविकता क्या है ये हम अपनी बुद्धि व KNowledge से जानते हैं॥

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    October 11, 2011
  33. आकाश #

    ईश्वर के होने या न होने से या मानने अथवा न मानने व्यक्ति की बुद्धिमता पर कोई फर्क नहीं पडता ! ईश्वर में विश्वास केवल और केवल आस्था के ऊपर निर्भर है ! मेरा ये माना है कि ईश्वर को बनाने वाला और कोई नहीं बल्कि स्वार्थी इंसान ही है …अन्यथा देव मूर्तियों में ..पंडित प्राण प्रतिष्ठा नहीं किया करते ?

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    October 13, 2011
  34. ओम महल जी की बात पर बस हँसी आ सकती है…

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    October 16, 2011
  35. ISHWAR ko manne wal AASTIK aor na manne wala NASTIK ye VEECHAR h. HAN aor NAA ke beech
    gap h . ya ISHWAR h…….

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    February 29, 2012
  36. dhanraj labana #

    iswar vese hi mojud he jese dood me sakkr ? bhai ye thik he ?sakkr alag kar ke dehe.

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    April 4, 2012
  37. vishal shresth #

    ”na ma driskitano mudha:
    pra-pandhte naradhma:”
    bewkuf,papi,naradham manushya puchte hai….
    kya aap mujhe iswar dikhla sakte hai?
    areeeeee aapme aesi kaun si yogyata hai, jo aap iswer ko itni aasani se dekh lo, kya ye madari ka khel tamasa hai, paisa feka tamasa dekjha,,

    ”tash-sradhana munuya:”
    pehle sradha lao manushya
    apne is manav janm ko samjho,bhakt bano, gyan-vigyan ko samjho,
    karam karo, fal ki ikcha mat karo, sradha rakho manav ki, prakriti ki ,meri sewa karo, prem karo,
    viswas rakho naradharmi mat bano……….

    aap swatantra hai bhagwan ko mane ya na mane, magar apke result waho hoga jaesa aap exam doge

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    July 6, 2012
  38. Ram Lal Singhania #

    Great scientists( Newton, Einstein adi ) ne vigyan ke niyamo ki khoj ki. Jan – sadharan uska labh utha rahe hain. Usi prakar mahan rishiyon aur santon ( Yagyavalkya, Ramakrishna adi ) ne Ishwar ko pratyaksh dekha. Unki khoj ka labh hum kyon na uthaaye. Jab tak astha thi, hamare paas sab kuchch tha, abhi bhi dharm par astha hi hamein hamara sab kuchh vaapas dila sakti hai. Abhi hamara ye haal hai ki yadi hamare shastra koi baat kahen to hum use kachra samajhte hain aur vohi baat humse churakar pashchim wale bhonde dhang se humein paros dein to hum raal tapkate huwe udhar daud padte hain. Arre bharatiyo, asthawan bano, apne poorvajon ka makhaul mat udao. Unhi ke tukdon par hum pal rahe hain.

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    April 7, 2013
  39. ABHISHEK TIWARI #

    IT IS REALLY INSPIRATIONAL AND THE COVESATION OF THE BOY WITH HIS TEACHER HAD TOUCHED MY HEART . AND I ALSO WANT TO HAVE SUCH TYPE OF SKILL OF CONVERSATION .

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    December 30, 2013
  40. Prakas. #

    Vidharti.is tha good

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    March 17, 2014
  41. बेशक ईश्वर में आस्था रखने और न रखने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। परन्तु ईश्वर के होने और न होने से विज्ञान को फ़र्क पड़ता है। क्योंकि ईश्वर का हस्तक्षेप ज्ञात भौतिकी को नए रूप में प्रस्तुत करता है। विज्ञान ईश्वर के अस्तित्व को नकारता है। और इसके पीछे वह बहुत सुन्दर कारण प्रस्तुत करता है। विज्ञान के अनुसार ईश्वर का अस्तित्व असंभव है। क्योंकि यदि ईश्वर का अस्तित्व है तो वह भौतिकी का हिस्सा है। और यदि ईश्वर भौतिकी का हिस्सा नहीं है तो उसका अस्तित्व भी नही है। क्योंकि तब हम उसको प्रमाणित नहीं कर सकते। यानि कि भौतिकी के नियम ईश्वर के लिए भी होंगे। और वह उन नियमों का पालन भी करता होगा ! भले ही वह ईश्वर अपनी शक्ति के प्रयोग से भौतिकी के नियमों को परिवर्तित कर सकने में सक्षम हो। तब भी भौतिकी के वे परिवर्तित नियम उस ईश्वर (संरचना) पर भी लागू होंगे। जिसने भौतिकी के इन नए नियमों को बनाया है। इसलिए विज्ञान ईश्वर की व्याख्या को असंगत कहता हैं। यह भौतिकी की सुंदरता और ईश्वर के अस्तित्व को न मानने का तार्किक कारण है।

    इसके बाबजूद जो वैज्ञानिक ईश्वर को मानते हैं। दरअसल वे सभी वैज्ञानिक या तो ईश्वर के अस्तित्व होने की संगत परिस्थितियों को खोज रहे होते हैं ! या फिर ईश्वर को भौतिकी के नियमों के विश्लेषण में हुई चूक द्वारा परिभाषित करने का प्रयास करते हैं ! ईश्वर को परिभाषित करने वाला वैज्ञानिकों का वह समूह संभवतः ईश्वर को एक उन्नत विकसित प्रजाति के रूप में देखता है।

    यदि ईश्वर का अस्तित्व हुआ और हम उसे प्रमाणित करने में सफल रहे। तब भी विज्ञान को गलत ठहरना अनुचित होगा। क्योंकि विज्ञान इसी तरह कार्य करता है।

    संबंधित लेख :
    1. हस्तक्षेप : ईश्वर के अस्तित्व का आधार । http://www.basicuniverse.org/2013/09/Ishwar.html
    2. विज्ञान के पास एक सुन्दर कारण । http://www.basicuniverse.org/2014/04/Vigyan-ke-paas-ka-ek-Karan.html

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    November 22, 2014
  42. हर चीज के दो पहलू होते हैं अच्छाई-बुराई ,ईश्वर -शैतान …विज्ञान में ऎसी कई पहली है जिसे विज्ञानं भी नही सुलझा पाया है हमें इश्वर पर आस्था बने रखना चाहिए

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    November 24, 2014

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