“कौन है? : जलालुद्दीन रूमी की कहानी
किसी ने अपनी प्रियतमा के द्वार को खटखटाया. भीतर से आवाज़ आई – “कौन है?”
उसने कहा – “यह मैं हूँ!”
द्वार के भीतर से आवाज़ आई – “इस घर में मैं और तुम एक साथ नहीं रह सकते”.
द्वार नहीं खुला.
प्रेमी बियाबान में ठोकर खाता रहा. वह अपनी सुध-बुध खोकर हर घड़ी इसी प्रार्थना में डूबा रहता कि द्वार किसी तरह खुल जाए.
साल भर बाद वह लौटा और उसने द्वार को फिर से खटखटाया.
द्वार के पीछे से किसी ने फिर से पूछा – “कौन है?”
प्रेमी ने कहा – “तुम”.
और द्वार खुल गया.
चित्र साभार – विकीपीडिया
(An inspiring anecdote of Jalaluddin Rumi – in Hindi)

sunder ,mein ke liye jagah nahi.
उम्दा कहानी है.
मेरे ख़याल से अगर यहाँ आखिर में “तुम” की जगह “हम” होता तो ज्यादा अच्छा था, आपका क्या ख़याल है निशांत जी ?
वैभव जी, रूमी की यह बोध कथा में रूहानियत का अंदाज़ है जहाँ ‘मैं’ खो जाता है और सिर्फ ‘तू’ रह जाता है.
अहा!! अह्म का कोई स्थान नहीं..समर्पण का स्वागत है!!
प्रेम में अस्तित्वों के एकाकार होने की अनोखी कथा है यह । रूमी की यह कथा प्रेम की उस विराटता का पता देती है, जहाँ समस्त सांसारिक बोध खो जाता है ।
प्रेमी बियाबान में ठोकर खाता रहा और सोचता रहा उसके ’मै’ का रूपांतरण कैसे हो- वस्तुतः रूमी की यह कथा पहले तो मैं की उस दुष्कर खोज को रेखांकित करती है, जिसका पता ही नहीं लग पाता इस सांसारिक जीवन में । प्रेम की पवित्र सरणी में स्नान करने के पूर्व यह आवश्यक भी था कि पहले ’मैं’ ढूढ़ लिया जाता ।
कितना अच्छा होता यदि यह कथा एक कदम और आगे बढ़ती और प्रेमी एक दफा और दुत्कारा जाता अपनी प्रेमिका से – कि यहाँ ’मैं” ही नहीं ’तुम” का भी प्रवेश वर्जित है; क्योंकि यदि ’तुम’ भी शेष रह गया तो कहीं न कहीं ’मैं’ रह ही जायेगा । तो एक कदम आगे वर्षों की गूढ़तम खोज के बाद प्रेमी दुबारा वापस लौटता और दरवाजा खटखटाता । यह पूछने पर कि कौन ? जवाब देता – ’प्रेम ही’, और कौन । और द्वार खुल जाता ।
जहाँ मैं और तुम दोनॊं ही विलयित होकर प्रेम की साकार परिणिति में बदल गये हों वहाँ ही न रह पायेगी प्रेम की जीवन्त अभिव्यक्ति और चेतना अक्षुण्ण ।
मुझे यह कहानी ठीक नहीं लगती। कहा जाता है कि Intimacy breeds contempt. मालुम नहीं क्यों जो प्यार में अपना व्यक्तित्व खो देता है वह भी खो जाता है, उसका महत्व चला जाता है, उसे जीवन में दुख ही मिलते हैं। ऐसा मेरा जीवन का अनुभव है। हो सकता है कि मैं गलत हूं।
प्रेम मे अहँ कहीँ होता नहीँ।
ठीक है पर इस कहानी मे गहराई नहीँ है
गहराई के साथ लिखोBEST OE LICK
जी, कमेंट के लिए धन्यवाद.
मैं गहराई के साथ लिखने की कोशिश ज़रूर करूंगा.
आपको भी BEST OE LICK