असीम प्रेम और त्याग का उदाहरण

prison cell of father kolbeसंत मैक्सिमिलियन कोल्बे (1894-1941) पोलैंड के फ्रांसिस्कन मत के पादरी थे. नाजी हुकूमत के दौरान उन्हें जर्मनी की खुफिया पुलिस ‘गेस्टापो’ ने बंदी बना लिया. उन्हें पोलैंड के औश्वित्ज़ के यातना शिविर में भेज दिया गया.

एक दिन यातना शिविर में दैनिक हाजिरी के दौरान एक बंदी कम पाया गया. अधिकारियों ने यह निष्कर्ष निकाला कि वह भाग गया लेकिन बाद में उसका शव कैम्प के गुसलखाने में मिला. वह शायद भागने के प्रयास में पानी की टंकी में डूब गया था. अधिकारियों ने यह तय किया कि मृतक बंदी के भागने का प्रयास करने के कारण उसी बैरक के दस बंदियों को मृत्युदंड दे दिया जाए ताकि कोई दूसरा बंदी भागने का प्रयास करने का साहस न करे. जिन दस बंदियों का चयन किया गया उनमें फ्रान्सिजेक गज़ोनिव्ज़ेक भी था. जब उसने अपनी भावी मृत्यु के बारे में सुना तो वह चीत्कार कर उठा – “हाय मेरी बेटियाँ, मेरी बीवी, मेरे बच्चे! अब मैं उन्हें कभी नहीं देख पाऊँगा!” – वहां मौजूद सभी बंदियों की आँखों में यह दृश्य देखकर आंसू आ गए.

उसका दुःख भरा विलाप सुनकर फादर कोल्बे आगे आये और उसे ले जानेवालों से बोले – “मैं एक कैथोलिक पादरी हूँ. मैं उसकी जगह लेने के लिए तैयार हूँ. मैं बूढ़ा हूँ और मेरा कोई परिवार भी नहीं है”.

फ्रान्सिजेक के स्थान पर कोल्बे की मरने की फरियाद स्वीकार कर ली गई. फादर कोल्बे के साथ बाकी नौ बंदियों को एक कालकोठरी में बंद करके भूख और प्यास से मरने के लिए छोड़ दिया गया. फादर कोल्बे ने सभी बंदी साथियों से उस घड़ी में प्रार्थना करने और ईश्वर में अपनी आस्था दृढ़ करने के लिए कहा. वे बंदियों के लिए माला जपते और भजन गाते थे. भूख और प्यास से एक के बाद एक बंदी मरता गया. फादर कोल्बे अंत तक जीवित रहे और सबके लिए प्रार्थना करते रहे.

कुछ दिनों बाद जब कालकोठरी को खोलकर देखा गया तो फादर कोल्बे जीवित मिले. 14 अगस्त, 1941 के दिन उन्हें बाएँ हाथ में कार्बोलिक एसिड का इंजेक्शन देकर मार दिया गया. उन्होंने प्रार्थना करते हुए अपना हाथ इंजेक्शन लेने के लिए बढ़ाया था. जिस कालकोठरी में फादर कोल्बे की मृत्यु हुई अब वह औश्वित्ज़ जानेवाले यात्रियों के लिए किसी पावन तीर्थ की भांति है.

फादर कोल्बे द्वारा जीवनदान दिए जाने के 53 वर्ष बाद फ्रान्सिजेक गज़ोनिव्ज़ेक की मृत्यु 95 वर्ष की उम्र में 1995 में हुई. जब पोप जॉन पॉल द्वितीय ने 1982 में फादर कोल्बे को संत की उपाधि दी तब वह उस समय वहां अपने परिवार के साथ उपस्थित था.

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ईसा मसीह ने कहा था – “एक दूसरे को वैसे ही प्रेम करो जैसा मैं तुमसे करता हूँ. अपने मित्र का जीवन बचाने के लिए स्वयं मृत्यु का वरण कर लेना ही सबसे महान प्रेम है”.(जॉन 15:12, 13)

चित्र साभार : फ्लिकर

(A motivational / inspiring anecdote about the sacrifice of Saint Maximilian Kolbe – in Hindi)

2 Comments

Filed under संत-महात्मा

2 Responses to असीम प्रेम और त्याग का उदाहरण

  1. बहुत टची पोस्ट।

  2. राकेश कुमार सरसवाल

    जीवन का सार बहुत रहस्यमयी हैं इसे वो ही जान सकते हैं,जो मृत्यु के डर को छोड़ ईश्लर में अटूट विश्लाश रखते हैं1

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