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आइन्स्टीन के बहुत सारे प्रसंग और संस्मरण

नेशनल अकैडमी ऑफ़ साइंस, वाशिंगटन में बनाए गए आइंस्टाइन मेमोरियल में आइंस्टाइन की नायब मूर्ति

नेशनल अकैडमी ऑफ़ साइंस, वाशिंगटन में बनाए गए आइंस्टाइन मेमोरियल में आइंस्टाइन की नायब मूर्ति

अलबर्ट आइन्स्टीन ने तीन साल का होने से पहले बोलना और सात साल का होने से पहले पढ़ना शुरू नहीं कियावे हमेशा लथड़ते हुए स्कूल जाते थेअपने घर का पता याद रखने में उन्हें दिक्कत होती थी

उन्होंने देखा कि प्रकाश तरंगों और कणिकाओं दोनों के रूप में चलता है जिसे क्वानटा कहते हैं क्योंकि उनके अनुसार ऐसा ही होता हैउन्होंने उस समय प्रचलित ईथर सम्बंधित सशक्त अवधारणा को हवा में उड़ा दियाबाद में उन्होंने यह भी बताया कि प्रकाश में भी द्रव्यमान होता है और स्पेस और टाइम भिन्न-भिन्न नहीं हैं बल्कि स्पेस-टाइम हैं, और ब्रम्हांड घोड़े की जीन की तरह हो सकता है

अमेरिका चले जाने के बाद आइंस्टाइन की एक-एक गतिविधि का रिकार्ड हैउनकी सनकें प्रसिद्द हैंजैसे मोजे नहीं पहनना आदिइन सबसे आइंस्टाइन के इर्द-गिर्द ऐसा प्रभामंडल बन गया जो किसी और भौतिकविद को नसीब नहीं हुआ

आइन्स्टीन बहुत अब्सेंट माइंड रहते थेइसके परिणाम सदैव रोचक नहीं थेउनकी पहली पत्नी भौतिकविद मिलेवा मैरिक के प्रति वे कुछ कठोर भी थे और अपनी दूसरी पत्नी एल्सा और अपने पुत्र से उनका दूर-के-जैसा सम्बन्ध था

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आइन्स्टीन को एक १५ वर्षीय लड़की ने अपने होमवर्क में कुछ मदद करने के लिए चिठ्ठी लिखीआइन्स्टीन ने उसे पढ़ाई से सम्बंधित कुछ चित्र बनाकर भेजे और जवाब में लिखा – “अपनी पढ़ाई में गणित की कठिनाइयों से चिंतित मत हो, मैं तुम्हें यकीन दिलाता हूँ कि मेरी कठिनाइयाँ कहीं बड़ी हैं“।

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सोर्बोन में १९३० में आइन्स्टीन ने एक बार कहा – “यदि मेरे सापेक्षता के सिद्धांत की पुष्टि हो जाती है तो जर्मनी मुझे आदर्श जर्मन कहेगा, और फ्रांस मुझे विश्व-नागरिक का सम्मान देगालेकिन यदि मेरा सिद्धांत ग़लत साबित होगा तो फ्रांस मुझे जर्मन कहेगा और जर्मनी मुझे यहूदी कहेगा“।

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किसी समारोह में एक महिला ने आइंस्टीन से सापेक्षता का सिद्धांत समझाने का अनुरोध कियाआइन्स्टीन ने कहा:

मैडम, एक बार मैं देहात में अपने अंधे मित्र के साथ घूम रहा था और मैंने उससे कहा कि मुझे दूध पीने की इच्छा हो रही है“।

दूध?” – मेरे मित्र ने कहा – “पीना तो मैं समझता हूँ लेकिन दूध क्या होता है?”

दूध एक सफ़ेद द्रव होता है” – मैंने जवाब दिया

द्रव तो मैं जानता हूँ लेकिन सफ़ेद क्या होता है?”

सफ़ेदजैसे हंस के पंख“।

पंख तो मैं महसूस कर सकता हूँ लेकिन ये हंस क्या होता है?”

एक पक्षी जिसकी गरदन मुडी सी होती है“।

गरदन तो मैं जानता हूँ लेकिन यह मुडी सी क्या है?”

अब मेरा धैर्य जवाब देने लगामैंने उसकी बांह पकड़ी और सीधी तानकर कहा – “यह सीधी है!” – फ़िर मैंने उसे मोड़ दिया और कहा – “यह मुडी हुई है“।

ओह!” – अंधे मित्र ने कहा – “अब मैं समझ गया दूध क्या होता है“।

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जब आइन्स्टीन विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे तब एक दिन एक छात्र उनके पास आया। वह बोला – “इस साल की परीक्षा में वही प्रश्न आए हैं जो पिछले साल की परीक्षा में आए थे”।

“हाँ” – आइन्स्टीन ने कहा – “लेकिन इस साल उत्तर बदल गए हैं”।

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एक बार किसी ने आइन्स्टीन की पत्नी से पूछा – “क्या आप अपने पति का सापेक्षता का सिद्धांत समझ सकती हैं?”

“नहीं” – उन्होंने बहुत आदरपूर्वक उत्तर दिया – “लेकिन मैं अपने पति को समझती हूँ और उनपर यकीन किया जा सकता है।”

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१९३१ में चार्ली चैपलिन ने आइन्स्टीन को हौलीवुड में आमंत्रित किया जहाँ चैपलिन अपनी फ़िल्म ‘सिटी लाइट्स’ की शूटिंग कर रहे थे। वे दोनों जब अपनी खुली कार में बाहर घूमने निकले तो सड़क पर आनेजाने वालों ने हाथ हिलाकर दोनों का अभिवादन किया।

चैपलिन ने आइन्स्टीन से कहा – “ये सभी आपका अभिवादन इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इनमें से कोई भी आपको नहीं समझ सकता; और मेरा अभिवादन इसलिए कर रहे हैं क्योंकि मुझे सभी समझ सकते हैं”।

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बर्लिन में सर विलियम रोथेन्स्तीन को आइन्स्टीन का एक पोर्ट्रेट बनाने के लिए कहा गया। आइन्स्टीन उनके स्टूडियो में एक वयोवृद्ध सज्जन के साथ आते थे जो एक कोने में बैठकर चुपचाप कुछ लिखता रहता था। आइन्स्टीन वहां भी समय की बर्बादी नहीं करते थे और परिकल्पनाओं और सिद्धांतों पर कुछ न कुछ कहते रहते थे जिसका समर्थन या विरोध वे सज्जन अपना सर हिलाकर कर दिया करते थे। जब उनका काम ख़त्म हो गया तब रोथेन्स्तीन ने आइन्स्टीन से उन सज्जन के बारे में पूछा:

“वे बहुत बड़े गणितज्ञ हैं” – आइन्स्टीन ने कहा – “मैं अपनी संकल्पनाओं की वैधता को गणितीय आधार पर परखने के लिए उनकी सहायता लेता हूँ क्योंकि मैं गणित में कमज़ोर हूँ”।

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१९१५ में आइन्स्टीन के सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत के प्रकाशन के बाद रूसी गणितज्ञ अलेक्सेंडर फ्रीडमैन को यह जानकर बहुत आश्चर्य हुआ कि आइन्स्टीन अपने सूत्रों के आधार पर यह देखने से चूक गए थे कि ब्रम्हांड फ़ैल रहा थाब्रम्हांड के फैलने का पता एडविन हबल ने १९२० में लगाया था

आइन्स्टीन से इतनी बड़ी गलती कैसे हो गई? असल में उन्होंने अपने सूत्रों में एक बहुत बेवकूफी भरी गलती कर दी थीउन्होंने इसे शून्य से गुणा कर दिया थाप्राचीन काल से ही गणित के साधारण छात्र भी यह जानते हैं कि किसी भी संख्या को शून्य से गुणा कर देना गणित की दृष्टि से बहुत बड़ा पाप है

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आइन्स्टीन ने एक बार कहा – “बचपन में मेरे पैर के अंगूठे से मेरे मोजों में छेद हो जाते थे इसलिए मैंने मोजे पहनना बंद कर दिया”।

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आइन्स्टीन के एक सहकर्मी ने उनसे उनका टेलीफोन नंबर पूछा। आइन्स्टीन पास रखी टेलीफोन डायरेक्टरी में अपना नंबर ढूँढने लगे। सहकर्मी चकित होकर बोला – “आपको अपना ख़ुद का टेलीफोन नंबर भी याद नहीं है?”

“नहीं” – आइन्स्टीन बोले – “किसी ऐसी चीज़ को मैं भला क्यों याद रखूँ जो मुझे किताब में ढूँढने से मिल जाती है”।

आइन्स्टीन कहा करते थे कि वे कोई भी ऐसी चीज़ याद नहीं रखते जिसे दो मिनट में ही ढूँढा जा सकता हो।

चित्र साभार – फ्लिकर
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10 Comments Post a comment
  1. सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi #

    निशांतजी आपका खजाना लगातार बढ़ रहा है।

    कई संस्‍मरण एक साथ परोसने के लिए आभार।

    Like

    April 24, 2009
  2. Shikha Deepak #

    अनोखी और रोचक जानकारी………शुक्रिया।

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    April 24, 2009
  3. अनिल कान्त : #

    wow …ultimate bhai …maza aa gaya padhkar

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    April 24, 2009
  4. उन्मुक्त #

    मैंने तो यह सुना था कि एक बार जब आइंस्टाइन की सेक्रेटेरी उनसे सापेक्षिता का सिद्धान्त के बारे में पूछा तो उन्होंने, उसे कुछ इस प्रकार से समझाया था,
    ‘When you sit on a hot stove, you feel one minute is one hour but when you sit next to your sweetheart, you feel one hour is one minute.’
    जब आप एक गर्म तवे पर बैठते हैं तब आपको एक मिनट एक घन्टा लगता है पर जब आप अपने प्रिय जन के पास बैठते हैं तो एक घन्टा एक मिनट लगता है

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    April 25, 2009
  5. ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey #

    बहुत सुन्दर पोस्ट!

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    April 25, 2009
  6. M.A.Sharma "सेहर" #

    Such a motivating ,interesting blog !!!

    Regards

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    April 25, 2009
  7. इष्ट देव सांकृत्यायन #

    आइंस्टीन के बारे में इतनी किंवदंतियां हैं कि क्या कहा जाए! वैसे हर बड़े आदमी के साथ ऐसा होता है. मुझे इसकी वजह यह लगती है कि वे बड़े इसीलिए होते हैं कि सिर्फ़ बड़ी चीज़ों पर ध्यान देते हैं और हम छोटे इसीलिए रह जाते हैं कि हम सिर्फ़ मोजों, टेलीफोन नम्बरों और ऐसी ही छोटी-छोटी चीजों में अपना समय बर्बाद करते रहते हैं. ऐसी बातें राहुल, निराला, फिराक़ आदि के बारे में भी कही जाती हैं.

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    April 25, 2009
  8. सुशील कुमार छौक्कर #

    रोचक।

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    April 26, 2009
  9. ajay sharma #

    बहुत रोचक जानकारी हैं.

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    February 2, 2011

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