जर्मनी से निर्वासित हो जाने के बाद मार्क्स लन्दन में आ बसे। लन्दन के जीवन का वर्णन जेनी ने इस प्रकार किया है – “मैंने फ्रेंकफर्ट जाकर चांदी के बर्तन गिरवी रख दिए और कोलोन में फर्नीचर बेच दिया। लन्दन के मंहगे जीवन में हमारी सारी जमापूँजी जल्द ही समाप्त हो गई। सबसे छोटा बच्चा जन्म से ही बहुत बीमार था। मैं स्वयं एक दिन छाती और पीठ के दर्द से पीड़ित होकर बैठी थी कि मकान मालकिन किराये के बकाया पाँच पौंड मांगने आ गई। उस समय हमारे पास उसे देने के लिए कुछ भी नहीं था। वह अपने साथ दो सिपाहियों को लेकर आई थी। उन्होंने हमारी चारपाई, कपड़े, बिछौने, दो छोटे बच्चों के पालने, और दोनों लड़कियों के खिलौने तक कुर्क कर लिए। सर्दी से ठिठुर रहे बच्चों को लेकर मैं कठोर फर्श पर पड़ी हुई थी। दूसरे दिन हमें घर से निकाल दिया गया। उस समय पानी बरस रहा था और बेहद ठण्ड थी। पूरे वातावरण में मनहूसियत छाई हुई थी।”
और ऐसे में ही दवावाले, राशनवाले, और दूधवाला अपना-अपना बिल लेकर उनके सामने खड़े हो गए। मार्क्स परिवार ने बिस्तर आदि बेचकर उनके बिल चुकाए।
ऐसे कष्टों और मुसीबतों से भी जेनी की हिम्मत नहीं टूटी। वे बराबर अपने पति को ढाढस बांधती थीं कि वे धीरज न खोयें।
कार्ल मार्क्स के प्रयासों की सफलता में जेनी का अकथनीय योगदान था। वे अपने पति से हमेशा यह कहा करती थीं – “दुनिया में सिर्फ़ हम लोग ही कष्ट नहीं झेल रहे हैं।”
(मार्क्स दंपत्ति का चित्र यहाँ से लिया गया है)
(An anecdote of Jenny Marx – Wife of Karl Marx – in Hindi)


अत्यन्त प्रेऱक प्रसंग। यदि कार्लमार्क्स का जीवन भी उद्घाटित किया जाए तो उस के बारे में भी जानकारी प्राप्त हो सके।
इस आलेख के लिए आभार
सच्ची बात।
“दुनिया में सिर्फ़ हम लोग ही कष्ट नहीं झेल रहे हैं।”
IS PRASANG ME SAHI KAHA GAYA HAI KI “DUNIYA MEIN HAM HI LOG KASHTH NAHI CHHEL RAHE HAI
APKO BAHUT DHANYAWAD
KAL MARKS KI JIVANI BHI PADNA CHAHATA HU NISHAT JI
Badhiya hai – jeevan main is ehsas ke aate hee apna dukh chhota lagne lagata hai
manv manv ka sosan band kar de to koi dukhi nhi hoga jivan ak khel ha aa jivan ka peta kisi ke pas nhi ha eis duniya me koi kisi ka nhi ha patni bhi sath nhi jalti arthi par
karl marks is diamond……
nice………………..nice……………………………nice………………….
Mera jivan marz se kaphi prabhvit hua hai.
vastv me marx ek mahan purus tha jo apni bato pe marte dam ta ada raha
usne is duniya ko ek aisa drsan diya jise yah duniya bhula nahi ski
aapke dwara di gayee yah jaankaari un logon ke gaal pr ek tamacha hai jo log maante hain ki saamyawaad ki baten krne wale log keval bhasan jhaadte hain aur samaanta ke naam pr apne ko alag rakhte huye doosron ki samanta ki baten krte hain…
yah Jeni ka mahan tyaag he thaa jisne mahan karl ko poori duniyaan ke saamne aaj ek wibhooti bana kr rakh diya hai…
Kaal marks ki vicharoon per unki garibi ka perbhaw pada tha
jeni ka biswash nai unka sabse bada tagta tha. aru unaka garibi nai bishwo ko marga darshan kar harehe
यह प्रशंग उन लोगों को सुकून जरूर देगा जिनकी जिंदगी में आज भी तपस्या है ।
i like this
सर, ये प्रसंग अच्छा लगा किंतु जो आपने बताया कि उनके कुछ संताने अभाव के कारण काल कलवित हो गई इसके लिये मै ये कहना चाहता हॅूं कि हमें अपने सिद्धांत अपने और अपनी पत्नी के लिये रखना चाहिये न कि उन शिशुओं के लिये जिन्हें भगवान ने हमे दिया है कम से कम हमें इतना तो कमना चाहिये कि उन बच्चों को भरपेट भोजन सोने से पहले तो दे सकें आपने बताया कि उनकी पत्नी के पिता एक अच्छे व्यवसासी थे किंतु सर यदि हमारे बच्चे को इस तरह से कोई तकलीफ है तो उसके नाना जो कि सामर्थवान हैं उसकी जिन्दगी के लिये कुछ हेल्प कर सकते हैं तो लेने में क्या बुराई है
आज के परिवेश में यदि बच्चों को बडे होने पर पता पडे कि उसके पिता ने उसे इसलिये नही पढाया कि वह किसी के आगे हाथ पैर नही जोडना चाहता था तो उसके बच्चे से पूछिए उसके पास क्या जबाब होगा
बहुत से मॉं-बाप ऐसे हैं जो शादी के बाद तलाक ले लेते हैं जिससे उनके बच्चों की जिंदगी सौतेले वाप या मां के आंचल में रह कर पूरी की पूरी बिगड जाती है क्यों कुछ मॉं के सिद्धांत होते हैं और कुछ पिता के जिसके कारण वे अपने सिद्धांतों के लिये उन बच्चों को जीवन खराब कर देते हैं जिन्होंने होश भी नही संभाला होता
मै ये नही कह रहा किं बुरे दिन किसी पर नही आते लेकिन यदि ऑप्शन मौजूद है तो अपने बच्चे को मरने से बचाने में आप अपना कर्तव्य पूरा कर सकते हैं
yey artical therai ramro 6
द्विवेदी जी से सहमति…वाकई जेनी बहुत सुन्दर हैं…वैसे मार्क्स भी अच्छे ही दिखते हैं…