चम्मचों की कहानी

spoonएक संतपुरुष और ईश्वर के मध्य एक दिन बातचीत हो रही थी। संत ने ईश्वर से पूछा – “भगवन, मैं जानना चाहता हूँ कि स्वर्ग और नर्क कैसे दीखते हैं।”

ईश्वर संत को दो दरवाजों तक लेकर गए। उन्होंने संत को पहला दरवाज़ा खोलकर दिखाया। वहां एक बहुत बड़े कमरे के भीतर बीचोंबीच एक बड़ी टेबल रखी हुई थी। टेबल पर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ पकवान रखे हुए थे जिन्हें देखकर संत का मन भी उन्हें चखने के लिए लालायित हो उठा।

लेकिन संत ने यह देखा की वहां खाने के लिए बैठे लोग बहुत दुबले-पतले और बीमार लग रहे थे। ऐसा लग रहा था कि उन्होंने कई दिनों से अच्छे से खाना नहीं खाया था। उन सभी ने हाथों में बहुत बड़े-बड़े कांटे-चम्मच पकड़े हुए थे। उन काँटों-चम्मचों के हैंडल २-२ फीट लंबे थे। इतने लंबे चम्मचों से खाना खाना बहुत कठिन था। संत को उनके दुर्भाग्य पर तरस आया। ईश्वर ने संत से कहा – “आपने नर्क देख लिया।”

फ़िर वे एक दूसरे कमरे में गए। यह कमरा भी पहलेवाले कमरे जैसा ही था। वैसी ही टेबल पर उसी तरह के पकवान रखे हुए थे। वहां बैठे लोगों के हाथों में भी उतने ही बड़े कांटे-चम्मच थे लेकिन वे सभी खुश लग रहे थे और हँसी-मजाक कर रहे थे। वे सभी बहुत स्वस्थ प्रतीत हो रहे थे।

संत ने ईश्वर से कहा – “भगवन, मैं कुछ समझा नहीं।”

ईश्वर ने कहा – “सीधी सी बात है, स्वर्ग में सभी लोग बड़े-बड़े चम्मचों से एक दूसरे को खाना खिला देते हैं। दूसरी ओर, नर्क में लालची और लोभी लोग हैं जो सिर्फ़ अपने बारे में ही सोचते हैं।”

(Story – Heaven and Hell – Spoons – Hindi)

6 Comments

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6 Responses to चम्मचों की कहानी

  1. परमजीत बाली

    बहुत बढिया पोस्ट लिख रहें हैं आप।

  2. इष्ट देव सांकृत्यायन

    अति उत्तम भाई. अब तो आपके यहाँ रेगुलर आना पडेगा.

  3. संगीता पुरी

    बहुत अच्‍छी कथाओं का संकलन है आपके पास….बहुत आभार।

  4. Vivek Gupta

    बहुत सुंदर

  5. Zakir Ali 'Rajneesh' (S.B.A.I.)

    प्रेरक कहानी। शुक्रिया।

  6. Reema

    ये बहुत अच्छी सीख देती है- स्वर्ग व नर्क संसाधनों से नहीं बल्की आपसी व्यवहार से बनते हैं. वैसे ये चम्मचों के कारण इस कहानी का “westernised version” लगता है — अच्छी बात है क्योंकि सन्देश पहुँचना चाहिए. उसके लिए अगर सुनने या पढने वालों के समाज के रहन-सहन के अनुसार कहानी में थोडा बदलाव ला दिया जाए, तो समझने में आसानी होती है. मैंने इसका ब्रम्हा वाला वर्ज़न यहाँ पढ़ा था — http://ramyantar.blogspot.com/2009/03/blog-post_03.html

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